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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 716 of 770

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Page 716

७१४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! मोहिनीका यह वचन सुनकर महात्मा वसु जो भगवान् गोविन्दके अत्यन्त भक्त थे, उनके चिन्तनमें निमग्न हो गये। उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। हृदयमें हर्षकी बाढ़-सी आ गयी; अतः वे द्विजश्रेष्ठ मुग्ध होकर मोहिनीसे प्रसन्नतापूर्वक बोले।

पुरोहित वसुने कहा— देवि! भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र परम गोपनीय तथा रहस्योंमें भी अत्यन्त रहस्यभूत है। मैं बताता हूँ, सुनो। जो प्रकृति और पुरुषके भी नियन्ता, विधाताके भी विधाता और संहारकारी कालके भी संहारक हैं उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। देवि! ब्रह्म श्रीकृष्णस्वरूप है। सब अवतार उसीके हैं। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही अवतारी हैं। वे स्वयं ही सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वस्तुतः वे ही श्रीराम हैं और वे ही श्रीकृष्ण। सम्पूर्ण लोक प्राकृत गुणोंसे उत्पन्न हुए हैं। स्वयं

गोलोकधाम निर्गुण है। भद्रे! गोलोकमें जो ‘गो’ शब्द है, उसका अर्थ है तेज अथवा किरण। वेदवेत्ता पुरुषोंने ऐसा ही निरूपण किया है। देवि! वह तेजोमय ब्रह्म सदा निर्गुण है। गुणोंका उत्पादक भी वही माना गया है। प्रकृति उस परमात्माकी शक्ति मानी गयी है। प्रधान प्रकृतिको कार्यकारणरूप बताया गया है। पुरुषको साक्षी, सनातन एवं निर्गुण कहते हैं। पुरुषने प्रकृतिमें तेजका आधान किया। इससे सत्त्व आदि गुण उत्पन्न हुए। उन गुणोंसे महत्तत्त्वका प्रादुर्भाव हुआ। पुरुषके संकल्पसे वह महत्तत्त्व अहंकाररूपमें प्रकट हुआ। भद्रे! वह अहंकार द्रव्य, ज्ञान और क्रियारूपसे तथा वैकारिक, तैजस और तामसरूपसे तीन प्रकारका है। वैकारिक अहंकारसे मन तथा दस वैकारिक देवता प्रकट हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनीकुमार, ब्रह्मा, इन्द्र, उपेन्द्र, मित्र और मृत्यु। तैजस अहंकारसे इन्द्रियोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है। उनके दो भेद हैं—ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ। श्रोत्र, त्वचा, घ्राण, नेत्र तथा जिह्वा—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा सुभगे! वाणी, हाथ, पैर, शिश्न तथा गुदा—ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। साध्वी मोहिनी! तामस अहंकारसे शब्दकी उत्पत्ति हुई। उस शब्दसे आकाश प्रकट हुआ। आकाशसे स्पर्श हुआ और स्पर्शसे वायुतत्त्वका प्रादुर्भाव हुआ। वायुसे रूप प्रकट हुआ तथा रूपसे तेजकी उत्पत्ति हुई। सती! तेजसे रस हुआ तथा रससे जलकी उत्पत्ति हुई। जलसे गन्धकी उत्पत्ति हुई और गन्धसे पृथ्वी उत्पन्न हुई। इस पृथ्वीपर ही चराचर प्राणियोंकी स्थिति देखी जाती है। आकाश आदि तत्त्वोंमें क्रमशः एक, दो, तीन और चार गुण हैं। भूमिमें पाँच गुण बताये गये हैं। अतः ये पाँचों भूत विशेष कहे गये हैं। काल और मायाके अंशसे प्रेरित हुए इन पाँच भूतोंसे अचेतन अण्डकी उत्पत्ति हुई। सती मोहिनी! उसमें पुरुषके प्रवेश करनेसे वह सचेतन हो उठा। उस अण्डसे विराट् पुरुष उत्पन्न हुआ और वह जलके भीतर शयन