संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context- उत्तरभाग *
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बिछाकर भगवान्का चिन्तन करते हुए वे उसीपर सो गये। सोते समय उनके मनमें यही संकल्प था कि सबकी पीड़ा दूर करनेवाले देवाधिदेव भगवान् जनार्दन कैसे मुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। सो जानेपर चक्र धारण करनेवाले जगद्गुरु भगवान् वासुदेवने राजाको स्वप्नमें अपने स्वरूपका दर्शन कराया। राजाने स्वप्नमें देवदेव जगन्नाथका दर्शन किया। वे शङ्ख, चक्र धारण किये शान्तभावसे विराजमान थे। इनके दो हाथोंमें गदा और पद्म सुशोभित थे। शार्ङ्गधनुष, बाण और खड्ग भी उन्होंने धारण कर रखे थे। उनके सब ओर तेजका दिव्य मण्डल प्रकाशित हो रहा था। प्रलयकालीन सूर्यके समान उनकी दिव्य प्रभा उद्भासित हो रही थी। उनका श्रीअङ्ग नीले पुखराजके समान श्याम था। आठ भुजाओंसे सुशोभित भगवान् श्रीहरि गरुड़की पीठपर बैठे हुए थे। दर्शन देकर भगवान्ने उनकी ओर देखते हुए कहा—'परम बुद्धिमान् नरेश! तुम्हें साधुवाद है। तुम्हारे इस दिव्य यज्ञसे, भक्तिसे तथा श्रद्धासे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। महीपाल! तुम व्यर्थ सोचमें क्यों पड़े हो? राजन्! यहाँ जो जगत्पूज्य सनातनी प्रतिमा है, उसे तुम जिस प्रकार प्राप्त कर सकते हो, वह उपाय तुम्हें बताता हूँ। आजकी रात्रि बीतनेपर निर्मल प्रभातमें जब सूर्योदय हो, उस समय अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित समुद्रके जलप्रान्तमें जहाँ तरङ्गोंसे व्याप्त महती जलराशि दिखायी देती है, वहाँ तटपर ही एक बहुत बड़ा वृक्ष खड़ा है, जिसका कुछ भाग तो जलमें है और कुछ स्थलमें। वह समुद्रकी लहरोंकी थपेड़ें खाकर भी कम्पित नहीं होता। तुम हाथमें कुल्हाड़ी लेकर लहरोंके बीचसे होते हुए अकेले ही वहाँ चले जाना। तुम्हें वह वृक्ष दिखायी देगा। मेरे बताये अनुसार उसे पहचानकर निःशङ्कभावसे उस वृक्षको काट डालना। उस ऊँचे वृक्षको काटते समय तुम्हें वहाँ कोई अद्भुत वस्तु दिखायी देगी। उसी वृक्षसे भलीभाँति सोच-विचारकर तुम दिव्य प्रतिमाका निर्माण करो। मोहमें डालनेवाली इस चिन्ताको छोड़ दो।'
ऐसा कहकर महाभाग श्रीहरि अदृश्य हो गये। यह स्वप्न देखकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उस रात्रिके बीतनेकी प्रतीक्षा करते हुए वे भगवान्में मन लगाकर उठ बैठे और 'वैष्णव-मन्त्र' एवं 'विष्णुसूक्त' का जप करने लगे। प्रभात होनेपर वे उठे और भगवान्का स्मरण करते हुए विधिपूर्वक उन्होंने समुद्रमें स्नान किया, फिर पूर्वाह्णकृत्य पूरा करके वे नृपश्रेष्ठ समुद्रके तटपर गये। महाराज इन्द्रद्युम्नने अकेले ही समुद्रकी महावेलामें प्रवेश किया और उस तेजस्वी महावृक्षको देखा, जिसकी अन्तिम ऊपरी सीमा बहुत बड़ी थी। वह बहुत ऊँचेतक फैला हुआ था। वह पुण्यमय वृक्ष फलसे रहित था। स्निग्ध मजीठके समान उसका लाल रंग था। उसका न तो कुछ नाम था और न यही पता था कि वह किस जातिका वृक्ष है। उस वृक्षको देखकर राजा