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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 70

६८ | * संक्षिप्त नारदपुराण *

प्राप्त कर लेता है। भूपाल ! जो भक्तिभावसे युक्त हो देवमन्दिरमें नृत्य अथवा गान करता है, वह रुद्रलोकमें जाकर मोक्षका भागी होता है। जो मनुष्य देवमन्दिरमें बाजा बजाते हैं, वे हंसयुक्त विमानपर आरूढ़ हो ब्रह्माजीके धाममें जाते हैं। जो लोग देवालयमें करताल बजाते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो दस हजार युगोंतक विमानचारी होते हैं। जो लोग भेरी, मृदङ्ग, पटह, मुरज और डिंडिम आदि बाजोंद्वारा देवेश्वर भगवान् शिवको प्रसन्न करते हैं, उन्हें प्राप्त होनेवाले पुण्यफलका वर्णन सुनो। वे सम्पूर्ण कामनाओंसे पूजित हो स्वर्गलोकमें जाकर पाँच कल्पोंतक सुख भोगते हैं। राजन् ! जो मनुष्य देवमन्दिरमें शङ्खध्वनि करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके साथ सुख भोगता है। जो भगवान् विष्णुके मन्दिरमें ताल और झाँझ आदिका शब्द करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो सबके साक्षी, निरञ्जन एवं ज्ञानस्वरूप भगवान् विष्णु हैं, वे संतुष्ट होनेपर सब धर्मोंका यथायोग्य सम्पूर्ण फल देते हैं। भूपते! जिन देवाधिदेव सुदर्शनचक्रधारी श्रीहरिके स्मरण मात्रसे सम्पूर्ण कर्म सफल होते हैं, वे जगदीश्वर परमात्मा ही समस्त कर्मोंके फल हैं। पुण्यकर्म करनेवाले पुरुषोंद्वारा सदा स्मरण किये जानेपर वे भगवान् उनकी सब पीड़ाओंका नाश करते हैं। भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे जो कुछ किया जाता है, वह अक्षय मोक्षका कारण होता है। भगवान् विष्णु ही धर्म हैं। धर्मके फल भी भगवान् विष्णु ही हैं। इसी प्रकार कर्म, कर्मोंके फल और उनके भोक्ता भी भगवान् विष्णु ही हैं। कार्य भी विष्णु हैं, करण भी विष्णु हैं। उनसे भिन्न कोई भी वस्तु नहीं है*।

विविध प्रायश्चित्तका वर्णन, इष्टापूर्त्तका फल और सूतक, श्राद्ध तथा तर्पणका विवेचन

धर्मराज कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! अब मैं चारों वर्णोंके लिये वेदों और स्मृतियोंमें बताये हुए धर्मका क्रमशः वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो भोजन करते समय क्रोधमें या अज्ञानवश किसी अपवित्र वस्तुको या चाण्डाल एवं पतितको छू लेता है, उसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। वह क्रमानुसार अर्थात् अपवित्र वस्तुके स्पर्श करनेपर तीन रात और चाण्डाल या पतितका स्पर्श कर लेनेपर छः राततक पञ्चगव्यसे तीनों समय स्नान करे तो शुद्ध होता है। यदि कदाचित् भोजन करते समय ब्राह्मणके गुदासे मलस्राव हो जाय अथवा जूठे मुँह या अपवित्र रहनेपर ऐसी बात हो जाय तो उसकी शुद्धिका उपाय बतलाता हूँ। पहले वह ब्राह्मण शौच जाकर जलसे पवित्र होवे (अर्थात् शौच जाकर जलसे हाथ-पैरकी शुद्धि करके कुल्ला और स्नान करे)। तदनन्तर दिन-रात उपवास करके पञ्चगव्य पीनेसे शुद्ध होता है। यदि भोजन करते समय पेशाब हो जाय अथवा पेशाब करनेपर बिना शुद्ध हुए ही भोजन कर ले तो दिन-रात उपवास करे और अग्निमें


* यो देवः सर्वदृग्विष्णुर्ज्ञानरूपी निरञ्जनः। सर्वधर्मफलं पूर्णं संतुष्टः प्रददाति च॥
यस्य स्मरणमात्रेण देवदेवस्य चक्रिणः। सफलानि भवन्त्येव सर्वकर्माणि भूपते॥
परमात्मा जगन्नाथः सर्वकर्मफलप्रदः। सत्कर्मकर्तृभिर्नित्यं स्मृतः सर्वार्तिनाशनः।
तमुद्दिश्य कृतं यच्च तदानन्त्याय कल्पते॥
कर्माणि विष्णुश्च फलानि विष्णुः कर्माणि विष्णुश्च फलानि भोक्ता। कार्यं च विष्णुः करणानि विष्णुरस्मान्न किंचिद् व्यतिरिक्तमस्ति॥
(ना० पूर्व० १३।५०-५३)