संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context- उत्तरभाग * | ६९३
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शिवका दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता है। वह स्वर्गलोकमें जाता है। भगवान् वृषध्वजकी पूजा करके वहाँ मरा हुआ पुरुष शिवरूप हो जाता है। अथवा शरीर-भेदसे अत्यन्त दुर्लभ शिवगणका स्वरूप धारण करता है। इसी प्रदेशमें गौओंने स्वयं ब्रह्माजीके अनुरोधसे सम्पूर्ण लोकोंकी शान्तिके लिये तथा सबको पवित्र करनेके उद्देश्यसे अपना दुग्ध दान किया था; जिससे 'भद्रदोह' नामक सरोवर प्रकट हुआ, जो पवित्र, पापहारी एवं शुभ है। उस स्थानमें स्नान करनेवाला मनुष्य साक्षात् वागीश्वर होता है। वहाँ परमेष्ठी ब्रह्माजीने स्वयं ले आकर एक शिवलिङ्ग स्थापित किया है। फिर ब्रह्माजीसे लेकर भगवान् विष्णुने दूसरा शिवलिङ्ग स्थापित किया, जो 'हिरण्यगर्भ' के नामसे वहाँ विद्यमान है। तदनन्तर ब्रह्माजीने पुनः इसी कारणसे 'स्वर्लोकेश्वर' नाम शिवलिङ्ग स्थापित किया; जो स्वर्गीय लीलाका दर्शन करानेवाला है। देवताओंके स्वामी उन स्वर्लोकेश्वरका दर्शन करके मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यहाँ प्राणत्याग करनेसे फिर कभी वह संसारमें जन्म नहीं लेता। उसकी वह अक्षयगति होती है, जो केवल योगियोंके लिये सुलभ बतायी गयी है।
भूमण्डलके उसी प्रदेशमें देवताओंके लिये कण्टकरूप दैत्य व्याघ्रका रूप धारण करके रहता था। वह बड़ा बलवान् और अभिमानी था। भगवान् शङ्करने उसे मारा और उस स्थानपर व्याघ्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होकर नित्य निवास किया। उन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। हिमवान्के द्वारा स्थापित एक शिवलिङ्ग है, जो 'शैलेश्वर'के नामसे विख्यात है। भद्रे! शैलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उत्पल और विदल नामके जो दो दैत्य ब्रह्माजीके वरदानसे बलोन्मत्त हो रहे थे, वे दोनों स्त्री-विषयक लोलुपताके कारण पार्वतीजीके हाथसे मारे गये। एक शार्ङ्गधनुषसे मारा गया और दूसरा कुन्तक अर्थात् भालेसे। इन दोनों शस्त्रोंके नामपर दो शिवलिङ्ग स्थापित किये गये हैं। भद्रे! जो मनुष्य श्रेष्ठ स्थानमें विद्यमान उक्त दोनों लिङ्गोंका दर्शन करता है, वह जन्म-जन्ममें सिद्ध होकर कभी शोक नहीं करता। देवताओंने उनके सब ओर बहुत-से शिवलिङ्ग स्थापित किये हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य देहत्यागके पश्चात् भगवान् शिवका गण होता है। वाराणसी नदी परम पवित्र और सब पापोंका नाश करनेवाली है। यह इस पवित्र क्षेत्रको सुशोभित करके गङ्गामें मिली है। उसके सङ्गमपर ब्रह्माजीने उत्तम शिवलिङ्गकी स्थापना की है, जो 'सङ्ग Alfonso -> 'सङ्गमेश्वर'के नामसे संसारमें विख्यात है, उसका दर्शन करना चाहिये। शुभे! जो मानव इन देवनदियोंके सङ्गममें स्नान करके सङ्गमेश्वरका पूजन करता है, उसे जन्म लेनेका भय कैसे हो सकता है? भद्रे! भृगुपुत्र शुक्राचार्यने यहाँ एक शिवलिङ्ग स्थापित किया है, जो 'शुक्रेश्वर'के नामसे विख्यात है। सम्पूर्ण सिद्ध और देवता भी उसकी पूजा करते हैं। इसका दर्शन करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। मोहिनी! महादेवजीने यहाँ जम्बुक नामक दैत्यका वध किया था। तत्सम्बन्धी शिवलिङ्गका दर्शन करके मानव सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा स्थापित किये हुए इन शिवलिङ्गोंको तुम पुण्यलिङ्ग समझो। ये समस्त कामनाओंको देनेवाले हैं। मोहिनी! इस प्रकार इस अविमुक्तक्षेत्रमें मैंने तुम्हें ये सब शिवलिङ्ग बताये हैं।