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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 678 of 770

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Page 678

६७६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अधिकारी हो जाता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। फल्गुतीर्थमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे जो एक लाख अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह भी नहीं पाता। मनुष्यको गयामें जाकर अवश्य पिण्डदान करना चाहिये। वहाँके पिण्ड पितरोंको अत्यन्त प्रिय हैं। इस कार्यमें न तो विलम्ब करना चाहिये और न विघ्न डालना चाहिये।

(श्राद्धकर्ताको गयामें इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—) पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, मातामहके पिता प्रमातामह आदि (अर्थात् वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही और वृद्धप्रमातामही)—इन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्डदान अक्षय होकर प्राप्त हो। मेरे कुलमें जो मरे हैं, जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। मेरे भाई-बन्धुओंके कुलमें जो लोग मरे हैं और जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो फाँसीपर लटककर मरे हैं, जहर खाने या शस्त्रोंके आघातसे जिनकी मृत्यु हुई है और जो आत्मघाती हैं, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो यमदूतोंके अधीन होकर सब नरकोंमें यातनाएँ भोगते हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान करता हूँ। जो पशुयोनिमें पड़े हैं, पक्षी, कीट एवं सर्पका शरीर धारण कर चुके हैं अथवा जो वृक्षोंकी योनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर स्थित जो पितर और भाई-बन्धु आदि हैं तथा संस्कारहीन अवस्थामें जिनकी मृत्यु हुई है, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो मेरे भाई-बन्धु हों अथवा न हों या दूसरे जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षय होकर मिले। जो मेरे पिताके कुलमें मरे हैं, जो माताके कुलमें मरे हैं, जो गुरु, श्वशुर तथा बन्धु-बान्धवोंके कुलमें मरे हैं एवं इनके सिवा जो दूसरे भाई-बन्धु मृत्युको प्राप्त हुए हैं, मेरे कुलमें जिनका पिण्डदान-कर्म नहीं हुआ है, जो स्त्री-पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्धकर्मका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे और पङ्गु रहे हैं, जो विकृतरूपवाले या कच्चे गर्भकी दशामें मरे हैं, मेरे कुलमें मरे हुए जो लोग मेरे परिचित या अपरिचित हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षयभावसे प्राप्त हो। ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता साक्षी रहें। मैंने गयामें आकर पितरोंका उद्धार किया है। देव गदाधर! मैं पितृकार्य (श्राद्ध)-के लिये गयामें आया हूँ। भगवन्! आप ही इस बातके साक्षी हैं। मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया*।


* साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मोशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता ॥
आगतोऽस्मि गयां देव पितृकार्ये गदाधर। त्वमेव साक्षी भगवन्नृणोऽहमृणत्रयात् ॥
(ना० उत्तर० ४५।५८-५९)