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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 674 of 770

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Page 674

६७२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

किया। तदनन्तर ब्राह्मणोंके प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजीने वहाँ अनेक तीर्थ निर्माण किये और कहा—ब्राह्मणो! गयामें श्राद्ध करनेसे पवित्र हुए लोग ब्रह्मलोकगामी होंगे और जो लोग तुम्हारा पूजन और सत्कार करेंगे, उनके द्वारा सदा मैं पूजित होऊँगा। ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें प्राप्त होनेवाली मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—यह मनुष्योंके लिये चार प्रकारकी मुक्ति (-के साधन) हैं। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन तथा इन सबके संसर्गसे होनेवाला पाप—ये सब-के-सब गयाश्राद्धसे नष्ट हो जाते हैं। मरनेपर जिनका दाह-संस्कार नहीं हुआ है, जो पशुओंद्वारा मारे गये हैं अथवा जिन्हें सर्पने डँस लिया है, वे सब लोग गयाश्राद्धसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं।

देवि! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास सुना जाता है। त्रेतायुगमें विशाल नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो विशालापुरीमें रहते थे। वे अपने सद्गुणोंके कारण धन्य समझे जाते थे। उनमें धैर्यका विलक्षण गुण था। उन्होंने श्रेष्ठ तीर्थ गयाशिरमें आकर पितृयाग प्रारम्भ किया। उन्होंने विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान दिया। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें उत्तम आकृतिसे युक्त तीन पुरुषोंको देखा, जो क्रमशः श्वेत, लाल और काले रंगके थे। उन्हें देखकर राजाने पूछा—'आपलोग कौन हैं?'

सित (श्वेत)-ने कहा—राजन्! मैं तुम्हारा पिता सित हूँ। मेरा नाम तो सित है ही, मेरे शरीरका वर्ण भी सित (श्वेत) है । साथ ही मेरे कर्म भी सित (उज्ज्वल) हैं और ये जो लाल रंगके पुरुष दिखायी देते हैं, ये मेरे पिता हैं। इन्होंने बड़े निष्ठुर कर्म किये हैं। वे ब्रह्महत्यारे और पापाचारी रहे हैं और इनके बाद ये जो तीसरे सज्जन हैं, ये तुम्हारे प्रपितामह हैं। ये नामसे तो कृष्ण हैं ही, कर्म और वर्णसे भी कृष्ण हैं। इन्होंने पूर्वजन्ममें अनेक प्राचीन ऋषियोंका वध किया है। ये दोनों पिता और पुत्र अवीचि नामक नरकमें पड़े हुए हैं, अतः ये मेरे पिता और ये दूसरे इनके पिता, जो दीर्घकालतक काले मुखसे युक्त हो नरकमें रहे हैं और मैं, जिसने अपने शुद्ध कर्मके प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया था, तुझ मन्त्रज्ञ पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे हम तीनों ही बलात् मुक्त हो गये।

एक बार गया जाना और एक बार वहाँ पितरोंको पिण्ड देना भी दुर्लभ है; फिर नित्य वहीं रहनेका अवसर मिले, इसके लिये तो कहना ही क्या है! देश-कालके प्रमाणानुसार कहीं-कहीं मृत्युकालसे एक वर्ष बीतनेके बाद अपने भाई-बन्धु पतित पुरुषोंके लिये गयाकूपमें पिण्डदान करते हैं। एक समय किसी प्रेतराजने एक वैश्यसे अपनी मुक्तिके लिये अनुरोध करते हुए कहा—तुम गयातीर्थका दर्शन करके स्नान कर लेना और पवित्र होकर मेरा नाम ले मेरे लिये पिण्डदान करना। वहाँ पिण्ड देनेसे मैं अनायास ही प्रेतभावसे मुक्त हो सम्पूर्ण दाताओंको प्राप्त होनेवाले शुभ लोकोंमें चला जाऊँगा। वैश्यसे ऐसा कहकर अनुयायियोंसहित प्रेतराजने एकान्तमें विधिपूर्वक अपने नाम आदि अच्छी तरह बताये। वैश्य धनोपार्जन करके परम उत्तम गयातीर्थ नामक तीर्थमें गया। उस महाबुद्धि वैश्यने वहाँ पहले अपने पितरोंको पिण्ड आदि देकर फिर सब प्रेतोंके लिये क्रमशः पिण्डदान और धनदान किया। उसने अपने पितरों तथा अन्य कुटुम्बीजनोंके लिये भी पिण्डदान किया था। वैश्यद्वारा इस प्रकार पिण्ड दिये जानेपर वे सभी प्रेत प्रेतभावसे छूटकर द्विजत्वको प्राप्त हो ब्रह्मलोकमें चले गये। गयामें किये हुए श्राद्ध, जप, होम और तप अक्षय होते हैं। यदि पिताकी क्षयाह-तिथिको पुत्रोंद्वारा ये कर्म किये जायँ तो वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले