संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 672 of 770
Read in context६७० * संक्षिप्त नारदपुराण *
वह स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त होता है। जो मानव प्राण-त्यागके समय गङ्गाका स्मरण अथवा गङ्गाजलका स्पर्श करता है, वह पापी होनेपर भी परमगतिको प्राप्त होता है। जिन धीर पुरुषोंने गङ्गाजीके समीप जाकर अपने शरीरका त्याग किया है, वे देवताओंके समान हो गये। इसलिये मुक्ति देनेवाले दूसरे सब साधनोंको छोड़कर देहपातपर्यन्त गङ्गाजीका ही सेवन करे। जो महान् पापी होकर भी गङ्गाके समीपवर्ती आकाशमें, गङ्गातटकी भूमिपर अथवा गङ्गाजीके जलमें मरा है, वह ब्रह्मा, विष्णु और शिवके द्वारा पूजनीय अक्षयपदको प्राप्त कर लेता है। जो धर्मात्मा, पवित्र एवं साधुसम्मत प्राणधारी मनुष्य मन-ही-मन गङ्गाजीका चिन्तन करता है, वह परम गतिको प्राप्त कर लेता है। कोई कहीं भी मर रहा हो, परंतु मृत्युकाल उपस्थित होनेपर यदि वह गङ्गाजीका स्मरण करता है, तो वह शिवलोक अथवा विष्णुधामको जाता है। भगवान् शङ्करके अत्यन्त कर्कश जटाकलापसे निकलकर पापी सगर-पुत्रोंके शरीरकी राखको बहाकर गङ्गाजीने उन्हें स्वर्गलोक पहुँचाया था। पुरुषके शरीरकी जितनी हड्डियाँ गङ्गाजीमें मौजूद रहती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मनुष्यकी हड्डी जब गङ्गाजीके जलमें ले जाकर छोड़ी जाती है, उसी समयसे प्रारम्भ करके उसकी स्वर्गलोकमें स्थित होती है। जिस पुण्यकर्मा पुरुषकी हड्डी गङ्गाजीके जलमें पहुँचायी जाती है, उसकी ब्रह्मलोकसे किसी प्रकार पुनरावृत्ति नहीं होती। जिस मृतक पुरुषकी हड्डी दशाहाके भीतर गङ्गाजीके जलमें पड़ जाती है, उसे गङ्गामें मरनेका जैसा फल बताया गया है, उसी फलकी प्राप्ति होती है। अतः स्नान करके पञ्चगव्य छिड़ककर सुवर्ण, मधु, घी और तिलके साथ उस अस्थि-पिण्डको दोनेमें रख ले और प्रेतगणोंसे युक्त दक्षिण दिशाकी ओर देखते हुए 'नमोऽस्तु धर्माय' (धर्मराजको नमस्कार है) ऐसा कहकर जलमें प्रवेश करे और 'धर्मराज मुझपर प्रसन्न हों' ऐसा कहकर उस हड्डीको जलमें फेंक दे। तदनन्तर स्नान करके तीर्थवासी अक्षयवटका दर्शन करे और ब्राह्मणको दक्षिणा दे। ऐसा करनेपर यमलोकमें स्थित हुए पुरुषका स्वर्गलोकमें गमन होता है और वहाँ उसे देवराज इन्द्रके समान प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। गङ्गाजीकी बहती हुई मुख्य धारासे लेकर चार हाथतकका जो भाग है, उसके स्वामी भगवान् नारायण हैं। प्राण कण्ठतक आ जायँ तो भी उसमें प्रतिग्रह स्वीकार न करे। भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशीको गङ्गाजीका जल जहाँतक बढ़ जाता है, वहाँतककी भूमिको उनका गर्भ जानना चाहिये। उससे दूरका स्थान 'तीर' कहलाता है। साधारण स्थितिमें जहाँतक जल रहता है, उससे डेढ़ सौ हाथ दूरतक गर्भकी सीमा है। उससे परेका भू-भाग तट है। देवि! किन्हीं विद्वानोंका ऐसा ही मत है तथा यह श्रुतियों और स्मृतियोंको भी अभिमत है। तीरसे दो-दो कोस दोनों ओरका स्थान 'क्षेत्र' कहलाता