संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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करके उनकी पूजा करनेवाला पुरुष पुण्यका भागी होता है। जो इस प्रकार पंद्रह दिन भी निरन्तर पूजा करता है, वही देवताओंके समान हो जाता है और दीर्घकालतक पूजा करनेसे फलमें भी अधिकता होती है। पूर्वकालमें राजा जह्नुने वैशाख शुक्ला सप्तमीको क्रोधपूर्वक गङ्गाजीको पी लिया था और फिर अपने कानके दाहिने छिद्रसे उन्हें निकाल दिया। शुभानने ! उस स्थानपर आकाशकी मेखलारूप गङ्गाजीका पूजन करना चाहिये। वैशाख मासकी अक्षय-तृतीयाको तथा कार्तिकमें भी रातको जागरण करते हुए जौ और तिलसे भक्तिभावपूर्वक विष्णु, गङ्गा और शिवकी पूजा करनी चाहिये। उक्त सामग्रियोंके सिवा उत्तम गन्ध, पुष्प, कुंकुम, अगरु, चन्दन, तुलसीदल, बिल्वपत्र, बिजौरा नींबू आदि, धूप, दीप और नैवेद्यसे वैभव-विस्तारके अनुसार पूजा करनी उचित है। गङ्गाजीके तटपर किया हुआ यज्ञ, दान, तप, जप, श्राद्ध और देवपूजा आदि सब कर्म कोटि-कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो अक्षय-तृतीयाको गङ्गाजीके तटपर विधिपूर्वक घृतमयी धेनुका दान करता है, वह पुरुष सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न हो हंसभूषित सुवर्ण-रत्नमय विचित्र विमानपर बैठकर अपने पितरोंके साथ कोटिसहस्र एवं कोटिशत कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इसी प्रकार जो (कभी) गङ्गातटपर शास्त्रीय विधिसे गोदान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। यदि गङ्गातटपर वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक कपिला गौका दान दिया जाय तो वह गौ नरकमें पड़े हुए सम्पूर्ण पितरोंको तत्काल स्वर्ग पहुँचा देती है। जो गङ्गातटपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यभगवान्की प्रीतिके लिये ब्राह्मणोंको ग्रामदान करता है, उसे सम्पूर्ण दानोंका जो पुण्य है, समस्त यज्ञोंका जो फल है तथा सब प्रकारके तप, व्रत और पुण्यकर्मोंका जो फल बताया गया है, वह सहस्रगुना होकर मिलता है। उस दानके प्रभावसे दाता पुरुष करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी विमानपर बैठकर अपनी रुचिके अनुसार श्रीविष्णुधाममें अथवा श्रीशिवधाममें प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा-विहार करता है। देवता उसकी स्तुति करते रहते हैं। देवि ! जो अक्षयतृतीयाके दिन गङ्गातटपर श्रेष्ठ ब्राह्मणको सोलह माशा सुवर्ण दान करता है, वह भी दिव्यलोकोंमें पूजित होता है। अन्नदान करनेसे विष्णुलोककी और तिलदानसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। रत्नदानसे ब्रह्मलोक, गोदान और सुवर्णदानसे इन्द्रलोक तथा सुवर्णसहित वस्त्रदानसे गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है। विद्यादानसे मुक्तिदायक ज्ञान पाकर मनुष्य निरञ्जन ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।
एक वर्षतक गङ्गार्चन-व्रतका विधान और माहात्म्य, गङ्गातटपर नक्तव्रत करके भगवान् शिवका पूजन, प्रत्येक मासकी पूर्णिमा और अमावास्याको शिवाराधन तथा गङ्गा-दशहराके पुण्य-कृत्य एवं उनका माहात्म्य
**पुरोहित वसु बोले—**मोहिनि ! एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। दिव्यस्वरूपा गङ्गादेवीका ध्यान करके एक सेर अगहनीके चावलको दो सेर दूधमें पकाकर खीर तैयार करावे, उसमें मधु और घी मिला दे, वे दोनों पृथक्-पृथक् एक-एक तोला होने चाहिये। तदनन्तर भक्तिभावसे परिपूर्ण हो खीर, पूआ, लड्डू, मण्डल, आधा गुंजा सुवर्ण, कुछ चाँदी, चन्दन, अगरु, कर्पूर, कुंकुम, गुग्गुल, बिल्वपत्र, दूर्वा, रोचना, श्वेत चन्दन, नील कमल तथा