संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context* पूर्वभाग- चतुर्थ पाद *
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यह होलिका प्रह्लादको भय देनेवाली राक्षसी है। इसीलिये गीत-मङ्गलपूर्वक काष्ठ आदिके द्वारा लोग उसका दाह करते हैं। विप्रेन्द्र ! मतान्तरमें यह 'कामदेवका दाह' है।
पक्षान्त-तिथियाँ दो होती हैं-पूर्णिमा तथा अमावास्या। दोनोंके देवता पृथक्-पृथक् हैं। अतः अमावास्याका व्रत पृथक् बतलाया जाता है। नारद ! इसे सुनो। यह पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। चैत्र और वैशाखकी अमावास्याको पितरोंकी पूजा, पार्वणविधिसे धन-वैभवके अनुसार श्राद्ध, ब्राह्मणभोजन, विशेषतः गौ आदिका दान-ये सब कार्य सभी महीनोंकी अमावास्याको अत्यन्त पुण्यदायक बताये गये हैं। नारद ! ज्येष्ठकी अमावास्याको ब्रह्मसावित्रीका व्रत बताया गया है। इसमें भी ज्येष्ठकी पूर्णिमाके समान ही सब विधि कही गयी है। आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद मासमें पितृश्राद्ध, दान, होम और देवपूजा आदि कार्य अक्षय होते हैं। भाद्रपदकी अमावास्याको अपराह्नमें तिलके खेतमें पैदा हुए कुशोंको ब्रह्माजीके मन्त्रसे आमन्त्रित करके 'हुं फट्'* का उच्चारण करते हुए उखाड़ ले और उन्हें सदा सब कार्योंमें नियुक्त करे और दूसरे कुशोंको एक ही समय काममें लाना चाहिये। आश्विनकी अमावास्याको विशेषरूपसे गङ्गाजीके जलमें या गयाजीमें पितरोंका श्राद्ध-तर्पण करना चाहिये; वह मोक्ष देनेवाला है। कार्तिककी अमावास्याको देवमन्दिर, घर, नदी, बगीचा, पोखरा, चैत्य वृक्ष, गोशाला तथा बाजारमें दीपदान और श्रीलक्ष्मीजीका पूजन करना चाहिये।
कार्तिककी अमावास्याको गोशाला, बगीचा, पोखरा, नदी, बाजार आदिमें दीपदान
* निमन्त्रणसम्बन्धी ब्रह्माजीका मन्त्र इस प्रकार है-
विरञ्चिना सहोत्पन्ना परमेष्ठिन्निसर्गज। नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव ॥
'दर्भ! तुम ब्रह्माजीके साथ उत्पन्न हुए हो, साक्षात् परमेष्ठी ब्रह्माके स्वरूप हो और तुम स्वभावतः प्रकट हुए हो। हमारे सब पाप हर लो और हमारे लिये कल्याणकारी बनो।'