संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context* पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५८७
सुख, सौभाग्य तथा रूप प्राप्त करता है।
मार्गशीर्ष शुक्ला चतुर्दशीको शिवजीका व्रत किया जाता है। इसमें पहले दिन एक समय भोजन करना चाहिये और व्रतके दिन निराहार रहकर सुवर्णमय वृषकी पूजा करके उसे ब्राह्मणको दान देना चाहिये। तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर स्नानके पश्चात् कमलके फूल, गन्ध, माला और अनुलेपन आदिके द्वारा उमासहित भगवान् महेश्वरकी पूजा करे। उसके बाद ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करे। विप्रवर! यह शिवव्रत जो करते हैं, जो इसका उपदेश देते हैं, जो इसमें सहायक होते या अनुमोदन करते हैं, उन सबको यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। पौष शुक्ला चतुर्दशीको 'विरूपाक्षव्रत' बताया गया है। उस दिन यह चिन्तन करके कि 'मैं भगवान् कपर्दीश्वरका सामीप्य प्राप्त करूँगा' अगाध जलमें स्नान करे। विप्रवर! स्नानके पश्चात् गन्ध, माल्य, नमस्कार, धूप, दीप तथा अन्न-सम्पत्तिके द्वारा विरूपाक्ष शिवका पूजन करे। वहाँ चढ़ी हुई सब वस्तुएँ ब्राह्मणको देकर मनुष्य देवलोकमें देवताकी भाँति आनन्दका अनुभव करता है। माघ कृष्णा चतुर्दशीको 'यमतर्पण' बताया गया है। उस दिन सूर्योदयसे पूर्व स्नान करके सब पापोंसे छुटकारा पानेके लिये शास्त्रोक्त चौदह नामोंसे यमका तर्पण करे। तिल, कुशा और जलसे तर्पण करना चाहिये। उसके बाद ब्राह्मणोंको खिचड़ी खिलावे और स्वयं भी मौन होकर वही भोजन करे।
द्विजश्रेष्ठ! फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशीको 'शिवरात्रिव्रत' बताया गया है। उसमें दिन-रात निर्जल उपवास करके एकाग्रचित्त हो गन्ध आदि उपचारोंसे तथा जल, बिल्वपत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, स्तोत्रपाठ और जप आदिसे किसी स्वयम्भू आदि लिङ्गकी अथवा पार्थिव लिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। फिर दूसरे दिन उन्हीं उपचारोंसे पुनः पूजन करके ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और दक्षिणा देकर विदा करे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य महादेवजीकी कृपासे देवताओंद्वारा सम्मानित हो दिव्य भोग प्राप्त करता है। फाल्गुन शुक्ला चतुर्दशीको भक्तिपूर्वक गन्ध आदि उपचारोंसे दुर्गाजीकी पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन करावे और स्वयं एक समय भोजन करके रहे। नारद! जो इस प्रकार दुर्गाका व्रत करता है, वह इस लोक और परलोकमें भी मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है। चैत्र कृष्णा चतुर्दशीको उपवास करके केदारतीर्थका जल पीनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। सम्पूर्ण चतुर्दशीव्रतोंके उद्यापनकी सामान्य विधि बतायी जाती है। इसमें चौदह कलश रखे जाते हैं और सबके साथ सुपारी, अक्षत, मोदक, वस्त्र और दक्षिणा-द्रव्य होते हैं। घट ताँबेके हों या मिट्टीके, नये हों। टूटे-फूटे नहीं होने चाहिये। बाँसके चौदह डंडों और उतने ही पवित्रक, आसन, पात्र तथा यज्ञोपवीतोंकी भी व्यवस्था करनी चाहिये। शेष बातें उन-उन व्रतोंके साथ जैसी कही गयी हैं, उसी प्रकार करे।
बारह महीनोंकी पूर्णिमा तथा अमावास्यासे सम्बन्ध रखनेवाले व्रतों तथा सत्कर्मोंकी विधि और महिमा
**सनातनजी कहते हैं—**नारद! सुनो, अब मैं तुमसे पूर्णिमाके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, जिनका पालन करके स्त्री और पुरुष सुख और संतति प्राप्त करते हैं। विप्रवर! चैत्रकी पूर्णिमा मन्वादि तिथि कही गयी है। उसमें चन्द्रमाकी प्रसन्नताके लिये कच्चे अन्नसहित जलसे भरा हुआ घट दान