संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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गोपीवृन्द तथा गोसमुदायकी पूजा करे। तत्पश्चात् आरती करके अपराध क्षमा कराते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। उसके बाद आधी राततक वहीं रहे। आधी रातमें पुनः श्रीहरिको पञ्चामृत तथा शुद्ध जलसे स्नान कराये और गन्ध-पुष्प आदिसे पुनः उनकी पूजा करे। नारद! धनिया, अजवाइन, सोंठ, खाँड़ और घीके मेलसे नैवेद्य तैयार करके उसे चाँदीके पात्रमें रखकर भगवान्को अर्पण करे। फिर दशावतारधारी श्रीहरिका चिन्तन करते हुए पुनः आरती करके चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रमाको अर्घ्य दे। उसके बाद देवेश्वर श्रीकृष्णसे क्षमा-प्रार्थना करके व्रती पुरुष पौराणिक स्तोत्र-पाठ और गीत-वाद्य आदि अनेक कार्यक्रमोंद्वारा रात्रिका शेष भाग व्यतीत करे। तदनन्तर प्रातःकाल श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन करावे और उन्हें प्रसन्नतापूर्वक दक्षिणा देकर विदा करे। तत्पश्चात् भगवान्की सुवर्णमयी प्रतिमाको स्वर्ण, धेनु और भूमिसहित आचार्यको दान करे। फिर और भी दक्षिणा देकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी स्त्री, पुत्र, सुहृद् तथा भृत्यवर्गके साथ भोजन करे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य श्रेष्ठ विमानपर बैठकर साक्षात् गोलोकमें जाता है। इस जन्माष्टमीके समान दूसरा कोई व्रत तीनों लोकोंमें नहीं है, जिसके करनेसे करोड़ों एकादशियोंका फल प्राप्त हो जाता है। भाद्रपद शुक्ला अष्टमीको मनुष्य 'राधाव्रत' करे। इसमें भी पूर्ववत् कलशके ऊपर स्थापित श्रीराधाकी स्वर्णमयी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। मध्याह्नकालमें श्रीराधाजीका पूजन करके एकभुक्त व्रत करे। यदि शक्ति हो तो भक्त पुरुष पूरा उपवास करे। फिर दूसरे दिन भक्तिपूर्वक सुवासिनी स्त्रियोंको भोजन कराकर आचार्यको प्रतिमा दान करे। तत्पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार इस व्रतको समाप्त करना चाहिये। ब्रह्मर्षे! व्रती पुरुष विधिपूर्वक इस 'राधाष्टमीव्रत'के करनेसे व्रजका रहस्य जान लेता तथा राधापरिकरोंमें निवास करता है।
इसी तिथिको 'दूर्वाष्टमीव्रत' भी बताया गया है। पवित्र स्थानमें उगी हुई दूबपर शिवलिङ्गकी स्थापना करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, दही, अक्षत और फल आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करे। पूजाके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर अर्घ्य दे। अर्घ्य देनेके पश्चात् परिक्रमा