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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 565 of 770

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Page 565
* पूर्वभाग- चतुर्थ पाद *५६३

चाहिये। यह व्रत विशेष कल्याणकारी है। यदि यह सप्तमी हस्त नक्षत्रसे युक्त हो तो पापनाशिनी कही गयी है। इसमें किया हुआ दान, जप और होम सब अक्षय होता है। भाद्रपद शुक्ला सप्तमीको ‘आमुक्ताभरणव्रत’ बतलाया गया है। इसमें उमासहित भगवान् महेश्वरकी पूजाका विधान है। गङ्गाजल आदि षोडशोपचारसे भगवान्‌का पूजन, प्रार्थना और नमस्कार करके सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये उनका विसर्जन करना चाहिये। इसीको ‘फलसप्तमी’ भी कहते हैं। नारियल, बैगन, नारंगी, बिजौरा नीबू, कुम्हड़ा, बनभंटा और सुपारी—इन सात फलोंको महादेवजीके आगे रखकर सात तन्तुओं और सात गाँठोंसे युक्त एक डोरा भी चढ़ावे। फिर पराभक्तिसे उनका पूजन करके उस डोरेको स्त्री बायें हाथमें बाँध ले और पुरुष दाहिने हाथमें। जबतक वर्ष पूरा न हो जाय तबतक उसे धारण किये रहे। सात ब्राह्मणोंको खीर भोजन कराकर उन्हें विदा करे। उसके बाद बुद्धिमान् पुरुष व्रतकी पूर्णताके लिये स्वयं भी भोजन करे। पहले बताये हुए सातों फल सात ब्राह्मणोंको देने चाहिये। विप्रवर! इस प्रकार सात वर्षोंतक व्रतका पालन करके विधिवत् उपासना करनेपर व्रतधारी मनुष्य महादेवजीका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। आश्विनके शुक्ल पक्षमें जो सप्तमी आती है, उसे ‘शुभ सप्तमी’ जानना चाहिये। उसमें स्नान और पूजा करके तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी आज्ञा ले व्रतका आरम्भ करके कपिला गायका पूजन एवं प्रार्थना करे—

त्वामहं दद्मि कल्याणि प्रीयतामर्यमा स्वयम्।
पालय त्वं जगत्कृत्स्नं यतोऽसि धर्मसम्भवा॥

<p align="right">(ना० पूर्व० १।१६। ४१-४२)</p>

‘कल्याणी! मैं तुम्हारा दान करता हूँ, इससे साक्षात् भगवान् सूर्य प्रसन्न हों। तुम सम्पूर्ण जगत्का पालन करो; क्योंकि धर्मसे उत्पन्न हुई हो।’

ऐसा कहकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको नमस्कार करके उसे गाय और दक्षिणा दे। ब्रह्मन्! फिर स्वयं पञ्चगव्य पान करके रहे। इस प्रकार व्रत करके दूसरे दिन उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उनसे शेष बचे हुए प्रसादस्वरूप अन्नको स्वयं भोजन करे। जिसने श्रद्धापूर्वक इस शुभ सप्तमी नामक व्रतको किया है, वह देवदेव महादेवजीके प्रसादसे भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

कार्तिकके शुक्ल पक्षमें ‘शाकसप्तमी’ नामक व्रत करना चाहिये। उस दिन स्वर्णकमलसहित सात प्रकारके शाक सात ब्राह्मणोंको दान करे और स्वयं शाक भोजन करके ही रहे। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भोजन-दक्षिणा दे और स्वयं भी मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमीको ‘मित्र-व्रत’ बताया गया है। भगवान् विष्णुका जो दाहिना नेत्र है, वही साकार होकर कश्यपके तेज और अदितिके गर्भसे ‘मित्र’ नामधारी दिवाकरके रूपमें प्रकट हुआ है। अतः ब्रह्मन्! इस तिथिमें शास्त्रोक्त विधिसे उन्हींका पूजन करना चाहिये। पूजन करके मधुर आदि सामग्रियोंसे सात ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें सुवर्ण-दक्षिणा देकर विदा करे। तत्पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। विधिपूर्वक इस व्रतका पालन करके मनुष्य निश्चय ही सूर्यके लोकमें जाता है। पौष शुक्ला सप्तमीको ‘अभयव्रत’ होता है। उस दिन उपवास करके पृथ्वीपर खड़ा हो तीनों समय सूर्यदेवकी पूजा करे। तत्पश्चात् दूधमिश्रित अन्नसे बँधा हुआ एक सेर मोदक ब्राह्मणको दान करके सात ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें सुवर्णकी दक्षिणा दे विदा करके स्वयं भी भोजन करे। यह सबको अभय देनेवाला माना गया है। दूसरे ब्राह्मण उसी दिन ‘मार्तण्डव्रत’का उपदेश करते हैं। दोनों एक ही देवता होनेके कारण विद्वानोंने