Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 562 of 770

Read in context
Page 562

५६० * संक्षिप्त नारदपुराण *

और सौभाग्य देनेवाली सुन्दरी ललितादेवी ! आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अक्षय सौभाग्य प्रदान कीजिये।'

इस मन्त्रसे चम्पाके सुन्दर फूलोंद्वारा ललितादेवीकी विधिपूर्वक पूजा करके उनके आगे नैवेद्य रखे। खीरा, ककड़ी, कुम्हड़ा, नारियल, अनार, बिजौरा नींबू, तुंडीर, कारवेल्ल और चिर्भट आदि सामयिक फलोंसे देवीके आगे शोभा करके बढ़े हुए धानके अङ्कुर, दीपोंकी पंक्ति, अगुरु, धूप, सौहालक, करञ्झक, गुड़, पुष्प, कर्णवेष्ट (कानके आभूषण), मोदक, उपमोदक तथा अपने वैभवके अनुसार अनेक प्रकारके नैवेद्य आदिद्वारा विधिवत् पूजा करके रातमें जागरणका उत्सव मनावे। इस प्रकार जागरण करके सप्तमीको सबेरे ललिताजीको नदीके तटपर ले जाय। द्विजोत्तम ! वहाँ गन्ध, पुष्पसे गाजे-बाजेके साथ पूजा करके वह नैवेद्य आदि सामग्री श्रेष्ठ ब्राह्मणको दे। फिर स्नान करके घर आकर अग्निमें होम करे। देवताओं, पितरों और मनुष्योंका पूजन करके सुवासिनी स्त्रियों, कन्याओं तथा पन्द्रह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। भोजनके पश्चात् बहुत-सा दान देकर उन सबको विदा करे। अनेकानेक व्रत, तपस्या, दान और नियमसे जो फल प्राप्त होता है, वह इसी व्रतसे यहीं उपलब्ध हो जाता है। तदनन्तर नारी मृत्युके पश्चात् सनातन शिवधाममें पहुँचकर ललितादेवीके साथ उनकी सखी होकर चिरकालतक आनन्द भोगती है और पुरुष भगवान् शिवके समीप रहकर सुखी होता है।

भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षमें जो षष्ठी आती है, उसे 'चन्दनषष्ठी' कहते हैं। उस दिन देवीकी पूजा करके मनुष्य देवीलोकको प्राप्त कर लेता है। यदि वह षष्ठी रोहिणी नक्षत्र, व्यतीपात योग और मङ्गलवारसे संयुक्त हो तो उसका नाम 'कपिलाषष्ठी' होता है। कपिलाषष्ठीके दिन व्रत एवं नियममें तत्पर होकर सूर्यदेवकी पूजा करके मनुष्य भगवान् भास्करके प्रसादसे मनोवाञ्छित कामनाओंको पा लेता है। देवर्षिप्रवर ! उस दिन किया हुआ अन्नदान, होम, जप तथा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण आदि सब कुछ अक्षय जानना चाहिये। कपिलाषष्ठीको भगवान् सूर्यकी प्रसन्नताके लिये वस्त्र, माला और चन्दन आदिसे दूध देनेवाली कपिला गायकी पूजा करके उसे वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये। ब्रह्मन्! आश्विन शुक्ला षष्ठीको गन्ध आदि माङ्गलिक द्रव्यों और नाना प्रकारके नैवेद्योंसे कात्यायनीदेवीकी पूजा करनी चाहिये। पूजाके पश्चात् देवेश्वरी कात्यायनीदेवीसे क्षमा-प्रार्थना और उन्हें प्रणाम करके उनका विसर्जन करे। यहाँ बालूकी मूर्तिमें कात्यायनीकी प्रतिष्ठा करके उनकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करके कात्यायनीदेवीकी कृपासे कन्या मनके अनुरूप वर पाती है और विवाहिता नारी मनोवाञ्छित पुत्र प्राप्त करती है। कार्तिक शुक्ला षष्ठीको महात्मा षडाननने सम्पूर्ण देवताओंद्वारा दी हुई महाभागा देवसेनाको प्राप्त किया था। अतः इस