संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 493 of 770
Read in context- पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४९१
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केवल आदिमें ही श्रीं जोड़नेसे बारह अक्षरोंका मन्त्र होता है। पूर्वोक्त चक्रोंद्वारा इनका अङ्गन्यास करे, फिर भगवान्का ध्यान करके दस लाख जप करे और घीसे दशांश होम करे। इससे ये दोनों मन्त्रराज सिद्ध हो जाते हैं। सिद्ध होनेपर ये मनुष्योंके लिये सम्पूर्ण कामनाओं, समस्त सम्पदाओं तथा सौभाग्यको देनेवाले हैं। अष्टादशाक्षर-मन्त्रके अन्तमें क्लीं जोड़ दिया जाय तो वह पुत्र तथा धन देनेवाला होता है। इस मन्त्रके नारद ऋषि, गायत्री छन्द और श्रीकृष्ण देवता हैं। क्लीं बीज कहा गया है और स्वाहा शक्ति मानी गयी है। छः दीर्घ स्वरोंसे युक्त बीजमन्त्रद्वारा षडङ्ग-न्यास करे। 'दायें हाथमें खीर और बायें हाथमें मक्खन लिये हुए दिगम्बर गोपीपुत्र श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करें।' इस प्रकार ध्यान करके बत्तीस लाख मन्त्र जपे और प्रज्वलित अग्निमें मिश्री मिलायी हुई खीरसे दशांश आहुति दे, तत्पश्चात् पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर अष्टादशाक्षर-मन्त्रकी भाँति पूजन करे। कमलके आसनपर विराजमान श्रीकृष्णकी पूजा करके उनके मुखारविन्दमें खीर, पके केले, दही और तुरंतका निकाला हुआ माखन देकर तर्पण करे। पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष यदि इस प्रकार तर्पण करे तो वह वर्षभरमें पुत्र प्राप्त कर लेता है। वह जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे तर्पणसे ही प्राप्त हो जाती है।
वाक् (ऐं), काम (क्लीं) ङे विभक्त्यन्त कृष्ण शब्द (कृष्णाय) तत्पश्चात् माया (ह्रीं), उसके बाद 'गोविन्दाय' फिर रमा (श्रीं) तदनन्तर दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) उद्धृत करे, फिर ह् और स् ये दोनों ओकार और विसर्गसे संयुक्त होकर अन्तमें जुड़ जायें तो (ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविन्दाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ह्सों) बाईस अक्षरका मन्त्र होता है, जो वागीशत्व प्रदान करनेवाला है। इसके नारद ऋषि, गायत्री छन्द, विद्यादाता गोपाल देवता, क्लीं बीज और ऐं शक्ति है। विद्याप्राप्तिके लिये इसका विनियोग किया जाता है। इसका ध्यान इस प्रकार है—जो वाम भागके ऊपरवाले हाथोंमें उत्तम विद्यापुस्तक और दाहिने भागके ऊपरवाले हाथमें स्फटिक मणिकी मातृकामयी अक्षमाला धारण करते हैं। इसी प्रकार नीचेके दोनों शब्दब्रह्ममयी मुरली लेकर बजाते हैं, जिनके श्रीअङ्गोंमें गायत्री-छन्दमय पीताम्बर सुशोभित है, जो श्याम वर्ण कोमल कान्तिमान् मयूरपिच्छमय मुकुट धारण करनेवाले, सर्वज्ञ तथा मुनिवरोंद्वारा सेवित हैं, उन श्रीकृष्णका चिन्तन करे। इस प्रकार लीला करनेवाले भुवनेश्वर श्रीकृष्णका ध्यान करके चार लाख मन्त्र जप करे और पलाशके फूलोंसे दशांश आहुति देकर मन्त्रोपासक बीस अक्षरवाले मन्त्रके लिये कहे हुए विधानके अनुसार पूजन करे। इस प्रकार जो मन्त्रकी उपासना करता है, वह वागीश्वर हो जाता है। उसके बिना देखे हुए शास्त्र भी गङ्गाकी लहरोंके समान स्वतः प्रस्तुत हो जाते हैं।
'ॐ कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे। रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे॥' (हे कृष्ण! हे कृष्ण! हे महाकृष्ण! आप सर्वज्ञ हैं। मुझपर प्रसन्न होइये। हे रमारमण! हे विद्येश्वर! मुझे शीघ्र विद्या दीजिये।) यह तैंतीस अक्षरोंवाला महाविद्याप्रद मन्त्र है। इसके नारद ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और श्रीकृष्ण देवता हैं। मन्त्रके चारों चरणों और सम्पूर्ण मन्त्रसे पञ्चाङ्ग-न्यास करके श्रीहरिका ध्यान करे।
ध्यान
दिव्योद्याने विवस्वत्प्रतिममणिमये मण्डपे योगपीठे
मध्ये यः सर्ववेदान्तमयसुरतरोः संनिविष्टो मुकुन्दः।