संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context४७८ * संक्षिप्त नारदपुराण *
अब मैं भगवान् श्रीकृष्णके त्रिकाल पूजनका वर्णन करता हूँ, जो समस्त मनोरथोंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है।
प्रातःकालिक ध्यान
श्रीमदुद्यानसंवीतहेमभूरत्नमण्डपे ॥
लसत्कल्पद्रुमाधःस्थरत्नाब्जपीठसंस्थितम् ।
सुत्रामरत्नसंकाशं गुडस्निग्धालकं शिशुम् ॥
चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थलं
सुघोणधरमद्भुतस्मितमुखाम्बुजं सुन्दरम् ।
स्फुरद्विमलरत्नयुक्तकनकसूत्रनद्धं दधत्-
सुवर्णपरिमण्डितं सुभगपौण्डरीकं नखम् ॥
समुद्धूसरोरःस्थले धेनुधूल्या
सुपुष्टाङ्गमष्टापदाकल्पदीप्तम् ।
कटीरस्थले चारुजङ्घान्तयुग्मं
पिनद्धं क्वणत्किङ्किणीजालदाम्ना ॥
हसन्तं हसद्बन्धुजीवप्रसून-
प्रभापाणिपादाम्बुजोदारकान्त्या ।
दधानं करे दक्षिणे पायसान्नं
सुहैयंगवीनं तथा वामहस्ते ॥
लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्ये
स्थितं वासवाद्यैः सुरैरर्चिताङ्घ्रिम् ।
महीभारभूतामरारातियूथां-
स्ततः पूतनादीन् निहन्तुं प्रवृत्तम् ॥
(ना० पूर्व० ८० । ७५-८०)
'एक सुन्दर उद्यानसे घिरी हुई सुवर्णमयी भूमिपर रत्नमय मण्डप बना हुआ है। वहाँ शोभायमान कल्पवृक्षके नीचे स्थित रत्ननिर्मित कमलयुक्त पीठपर एक सुन्दर शिशु विराजमान है; जिसकी अङ्गकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। उसके काले-काले केश चिकने और घुँघराले हैं। उसके मनोहर कपोल हिलते हुए स्वर्णमय कुण्डलोंसे अत्यन्त सुन्दर लगते हैं, उसकी नासिका बड़ी सुघड़ है। उस सुन्दर बालकके मुखारविन्दपर मन्द मुसकानकी अद्भुत छटा छा रही है। वह सोनेके तारमें गूँथा और सोनेसे ही मढ़ा हुआ सुन्दर बघनखा धारण करता है, जिसमें परम उज्ज्वल चमकीले रत्न जड़े हुए हैं। गोधूलिसे धूसर वक्षःस्थलपर धारण किये हुए स्वर्णमय आभूषणोंसे उसकी दीप्ति बहुत बढ़ी हुई है। उसका एक-एक अङ्ग अत्यन्त पुष्ट है। उसकी दोनों पिण्डलियोंका अन्तिम भाग अत्यन्त मनोहर है। उसने अपने कटिभागमें घुँघरूदार करधनीकी लड़ बाँध रखी है, जिससे मधुर झनकार होती रहती है। खिले हुए बन्धुजीव (दुपहरिया)-के फूलकी अरुण प्रभासे युक्त करारविन्द और चरणारविन्दोंकी उदार कान्तिसे सुशोभित वह शिशु मन्द-मन्द हँस रहा है। उसने दाहिने हाथमें खीर और बायें हाथमें तुरन्तका निकाला हुआ माखन ले रखा है। ग्वालों, गोपसुन्दग्रियों और गौओंकी मण्डलीमें स्थित होकर वह बड़ी शोभा पा रहा है। इन्द्र आदि देवता उसके चरणोंकी समाराधना करते हैं। वह पृथ्वीके भारभूत दैत्यसमुदाय पूतना आदिका संहार करनेमें लगा है।'
इस प्रकार ध्यान करके पूर्ववत् एकाग्रचित्त हो भगवान्का पूजन करे। दही और गुड़का नैवेद्य लगाकर एक हजार मन्त्र-जप करे। इसी प्रकार मध्याह्नकालमें नारदादि मुनिगणों और देवताओंसे