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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 47 of 770

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Page 47
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद *
    ४५

महीने बीत जानेपर राजाकी जो जेठी रानी थी, उसके मनमें सौतकी समृद्धि देखकर पापपूर्ण विचार उत्पन्न हुआ। अतः उस पापिनीने छोटी रानीको जहर दे दिया; किंतु छोटी रानी प्रतिदिन आश्रमकी भूमि लीपने आदिके द्वारा मुनिकी भलीभाँति सेवा करती थीं, इसीलिये उस पुण्यकर्मके प्रभावसे रानीपर उस विषका असर नहीं हुआ। तत्पश्चात् तीन मास और व्यतीत होनेपर रानीने शुभ समयमें विषके साथ ही एक पुत्रको जन्म दिया। मुनिकी सेवासे रानीके सब पाप नष्ट हो चुके थे। अहो! लोकमें सत्सङ्गका कैसा माहात्म्य है? वह कौन-सा पाप नष्ट नहीं कर सकता और सत्सङ्गके प्रभावसे पाप नष्ट हो जानेपर पुण्यात्मा मनुष्योंको कौन-सा सुख अधिक-से-अधिक नहीं मिल सकता? जानकर और अनजानमें किया हुआ तथा दूसरोंसे कराया हुआ जो पाप है, उस सबको महात्मा पुरुषोंकी सेवा तत्काल नष्ट कर देती है। संसारमें सत्सङ्गके प्रभावसे जड भी पूज्य हो जाता है। जैसे भगवान् शंकरके द्वारा ललाटमें ग्रहण कर लिये जानेपर एक कलाका चन्द्रमा भी वन्दनीय हो गया। विप्रवर! इहलोक और परलोकमें सत्सङ्ग मनुष्योंको सदा उत्तम समृद्धि प्रदान करता है, इसलिये संत पुरुष परम पूजनीय हैं। मुनीश्वर ! महात्मा पुरुषोंके गुणोंका वर्णन करनेमें कौन समर्थ है ? अहो ! उनके प्रभावसे गर्भमें पड़ा हुआ विष तीन मासतक पचता रहा। यह कैसी अद्भुत बात है ? तेजस्वी मुनि और्वने गर (विष)-के सहित उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर उसका जातकर्म-संस्कार किया और उस बालकका नाम सगर रखा। माताने बालक सगरका बड़े प्रेमसे पालन-पोषण किया। मुनीश्वर और्वने यथासमय उसके चूडाकर्म तथा यज्ञोपवीत-संस्कार किये तथा राजाके लिये उपयोगी शास्त्रोंका उसे अध्ययन कराया। मुनि सब मन्त्रोंके ज्ञाता थे। उन्होंने देखा, सगर अब बाल्यावस्थासे कुछ ऊपर उठ चुका है और मन्त्रग्रहण करनेमें समर्थ है, तब उसे अस्त्र-शस्त्रोंकी मन्त्रसहित शिक्षा दी। नारदजी ! महर्षि और्वसे शिक्षा पाकर सगर बड़ा बलवान्, धर्मात्मा, कृतज्ञ, गुणवान् तथा परम बुद्धिमान् हो गया। धर्मज्ञ सगर अब प्रतिदिन अमित तेजस्वी और्व मुनिके लिये समिधा, कुशा, जल और फूल आदि लाने लगा। बालक बड़ा विनयी और सद्गुणोंका भण्डार था। एक दिन उसने अपनी माताको प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा।

सगरने कहा—माँ! मेरे पिताजी कहाँ चले गये हैं? उनका क्या नाम है और वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए हैं? यह सब बातें मुझे बताओ। मेरे मनमें यह सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है। संसारमें जिनके पिता नहीं हैं, वे जीवित होकर भी मरे हुएके समान हैं। जिसके माता-पिता जीवित नहीं हैं, उसे कोई सुख नहीं है। जैसे धर्महीन मूर्ख मनुष्य इस लोक और परलोकमें निन्दित होता है, वही दशा पितृहीन बालककी भी है। माता-पितासे रहित, अज्ञानी, अविवेकी, पुत्रहीन तथा ऋणग्रस्त पुरुषका जन्म व्यर्थ है। जैसे चन्द्रमाके बिना रात्रि, कमलके बिना तालाब और पतिके बिना स्त्रीकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार पितृहीन बालक भी शोभा नहीं पाता। जैसे धर्महीन मनुष्य, कर्महीन गृहस्थ और गौ आदि पशुओंसे हीन वैश्यकी शोभा नहीं होती, वैसे ही पिताके बिना पुत्र सुशोभित नहीं होता। जैसे सत्यरहित वचन, साधु पुरुषोंसे रहित सभा तथा दयाशून्य तप व्यर्थ है, वही दशा पिताके बिना बालककी होती है। जैसे वृक्षके बिना वन, जलके बिना नदी और वेगहीन घोड़ा निरर्थक होता है, वैसी ही पिताके