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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 45 of 770

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Page 45
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * ४३

ही होता है। द्विजश्रेष्ठ नारद ! उस समय बाहुकी बहुत निन्दा हुई थी। वे संसारमें अपने पुरुषार्थ और यशका नाश करके मरे हुएकी भाँति वनमें रहते थे। अकीर्तिके समान कोई मृत्यु नहीं है। क्रोधके समान कोई शत्रु नहीं है। निन्दाके समान कोई पाप नहीं है और मोहके समान कोई भय नहीं है। असूयाके समान कोई अपकीर्ति नहीं है, कामके समान कोई आग नहीं है, रागके समान कोई बन्धन नहीं है और सङ्ग अथवा आसक्तिके समान कोई विष नहीं है^१ इ.स प्रकार बहुत विलाप करके राजा बाहु अत्यन्त दुःखित हो गये। मानसिक संताप और बुढ़ापेके कारण उनका शरीर जर्जरीभूत हो गया। मुनिश्रेष्ठ ! इस तरह बहुत समय बीतनेके पश्चात् और्व मुनिके आश्रमके निकट रोगसे ग्रस्त होकर राजा बाहु संसारसे चल बसे। उनकी छोटी पत्नी यद्यपि गर्भवती थी तो भी दुःखसे आतुर हो दीर्घकालतक विलाप करके उसने पतिके साथ चितापर जल मरनेका विचार किया। इसी बीचमें परम बुद्धिमान् और्व मुनि, जो महान् तेजकी निधि थे, वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने उत्तम समाधिके द्वारा यह सब वृत्तान्त जान लिया था। मुनीश्वरगण तीनों कालोंके ज्ञाता होते हैं। वे असूयारहित महात्मा अपनी ज्ञानदृष्टिसे भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ देख लेते हैं। परम पुण्यात्मा और्व मुनि अपनी तपस्याके कारण तेजकी राशि जान पड़ते थे। वे उसी स्थानपर आये, जहाँ राजा बाहुकी प्यारी एवं पतिव्रता पत्नी खड़ी थी। मुनिश्रेष्ठ नारद ! रानीको चितापर चढ़नेके लिये उद्यत देख मुनिवर और्व धर्ममूलक वचन बोले।

और्वने कहा— महाराज बाहुकी प्यारी पत्नी ! तू पतिव्रता है; किंतु चितापर चढ़नेका अत्यन्त साहसपूर्ण कार्य न कर। तेरे गर्भमें शत्रुओंका नाश करनेवाला चक्रवर्ती बालक है। कल्याणमयी राजपुत्री ! जिनकी संतान बहुत छोटी हो, जो गर्भवती हों, जिन्होंने अभी ऋतुकाल न देखा हो तथा जो रजस्वला हों, ऐसी स्त्रियाँ पतिके साथ चितापर नहीं चढ़तीं—उनके लिये चितारोहणका निषेध है। श्रेष्ठ पुरुषोंने ब्रह्महत्या आदि पापोंका प्रायश्चित्त बताया है, पाखण्डी और परनिन्दकका भी उद्धार होता है; किंतु जो गर्भके बालककी हत्या करता है, उसके उद्धारका कोई उपाय नहीं है। सुव्रते ! नास्तिक, कृतघ्न, धर्मत्यागी और विश्वासघातीके उद्धारका भी कोई उपाय नहीं है^२। अतः शोभने ! तुझे यह महान् पाप नहीं करना चाहिये।


१. नास्त्यकीर्तिसमो मृत्युर्नास्ति क्रोधसमो रिपुः। नास्ति निन्दासमं पापं नास्ति मोहसमासवः॥
नास्त्यसूयासमाकीर्तिर्नास्ति कामसमोऽनलः। नास्ति रागसमः पाशो नास्ति सङ्गसमं विषम्॥
२. बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा। रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चितां शुभे॥
ब्रह्महत्यादिपापानां प्रोक्ता निष्कृतिरुत्तमैः। दम्भिनो निन्दकस्यापि भ्रूणघ्नस्य न निष्कृतिः॥
नास्तिकस्य कृतघ्नस्य धर्मोपेक्षाकरस्य च। विश्वासघातकस्यापि निष्कृतिर्नास्ति सुव्रते॥
(ना० पूर्व० ७।५२-५४)