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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 401 of 770

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Page 401
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९९

(११) ग्यारह-ग्यारह अक्षरके चार चरणोंसे जिस छन्दसमुदायकी सिद्धि होती है, उसका नाम त्रिष्टुप् है। प्रस्तारसे इसके २०४८ भेद होते हैं। त्रिष्टुप्के ही अनेक अवान्तर भेद इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उपजाति, दोधक, शालिनी, रथोद्धता और स्वागता आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। ये त्रिष्टुप्के किस संख्यावाले भेद हैं? इसका ज्ञान मूलोक्त रीतिसे कर लेना चाहिये। यहाँ उक्त सात छन्दोंके लक्षण और उदाहरण क्रमशः प्रस्तुत किये जाते हैं; क्योंकि प्राचीन और अर्वाचीन ग्रन्थोंमें इनके प्रयोग अधिक मिलते हैं।

(१) ‘इन्द्रवज्रा छन्द’—(में २ तगण, १ जगण और २ गुरु होते हैं—)
ऽऽ।ऽऽ ।।ऽ।ऽऽ
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥

(२) ‘उपेन्द्रवज्रा’— (-में १ जगण, १ तगण, १ जगण और दो गुरु होते हैं।) इन्द्रवज्राके प्रत्येक चरणका पहला अक्षर ह्रस्व हो जाय तो उपेन्द्रवज्रा-छन्द बन जाता है।
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त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

(३) इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा—दोनोंके मेलसे जो छन्द बनता है, उसका नाम 'उपजाति' है। उपजातिमें कोई चरण या पाद इन्द्रवज्राका होता है, तो कोई उपेन्द्रवज्राका। प्रस्तारवश उपजातिके चौदह भेद होते हैं। उन भेदोंके नाम इस प्रकार हैं—कीर्ति, वाणी, माला, शाला, हंसी, माया, जाया, बाला, आर्द्रा, भद्रा, प्रेमा, रामा, ऋद्धि तथा बुद्धि। इनका स्वरूप निम्नाङ्कित चक्रमें देखिये—

१इ.इ.इ.इ.शुद्धाइन्द्रवज्रा
२उ.इ.इ.इ.१ उपजातिकीर्ति
३इ.उ.इ.इ.२वाणी
४उ.उ.इ.इ.३माला
५इ.इ.उ.इ.४शाला
६उ.इ.उ.इ.५हंसी
७इ.उ.उ.इ.६माया
८उ.उ.उ.इ.७जाया
९इ.इ.इ.उ.८बाला
१०उ.इ.इ.उ.९आर्द्रा
११इ.उ.इ.उ.१०भद्रा
१२उ.उ.इ.उ.११प्रेमा
१३इ.इ.उ.उ.१२रामा
१४उ.इ.उ.उ.१३ऋद्धिः
१५इ.उ.उ.उ.१४बुद्धिः
१६उ.उ.उ.उ.शुद्धाउपेन्द्रवज्रा

उदाहरण—
ऽऽ ।ऽऽ ।।ऽ । ऽऽ
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥

पूर्वोक्त चक्रके अनुसार यह 'उपजाति' का बुद्धि नामक भेद है। इसीको विपरीतपूर्वा और आख्यानकी भी कहते हैं। इसमें पहला चरण इन्द्रवज्राका और शेष तीन चरण उपेन्द्रवज्राके हैं। जहाँ आदिसे तीन इन्द्रवज्राके और शेष (चौथा) उपेन्द्रवज्राका चरण हो, वहाँ 'बाला' नामक उपजाति होती है।

यथा—
ऽऽ ।ऽऽ ।।ऽ।ऽ ऽ
वन्द्यः स पुंसां त्रिदशाभिनन्द्यः
कारुण्यपुण्योपचयक्रियाभिः।
संसारसारत्वमुपैति यस्य
परोपकाराभरणं शरीरम्॥

(४) 'दोधकवृत्त' (-में तीन भगण और दो गुरु होते हैं—)
ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽऽ
दोधकमर्थविरोधकमग्र्यं
स्त्रीचपलं युधि कातरचित्तम्।
स्वार्थपरं मतिहीनममात्यं
मुञ्चति यो नृपतिः सः सुखी स्यात्॥

‘शालिनी’— (-में मगण, तगण, तगण और दो गुरु होते हैं—)
उदाहरण—
ऽऽ ऽऽऽ ऽ।ऽऽ।ऽऽ
रूपं यत्तत् प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्मज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम्।