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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 397 of 770

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Page 397
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३९५

कहा गया है। तीन अक्षरोंके समुदायका नाम गण है¹॥ ४॥ आर्या आदि छन्दोंमें चार मात्रावाले पाँच गण कहे गये हैं, जो चार लघुवाले गणसे युक्त हैं²। यदि लघु अक्षरसे परे संयोग, विसर्ग और अनुस्वार हो तो वह लघुकी दीर्घताका बोधक होता है³। इस छन्दःशास्त्रमें 'ग' का अर्थ गुरु या दीर्घ माना गया है और 'ल' का अर्थ लघु समझा जाता है। पद्य या श्लोकके एक चौथाई भागको पाद कहते हैं। विच्छेद या विरामका नाम 'यति' है॥ ५-६॥ नारद! वृत्त (छन्द)-के तीन भेद माने गये हैं—सम वृत्त, अर्धसम वृत्त तथा विषम वृत्त। जिसके चारों चरणोंमें समान लक्षण लक्षित होता हो, वह सम वृत्त⁴ कहलाता है॥ ७॥ जिसके प्रथम और तीसरे चरणोंमें एवं दूसरे तथा चौथे चरणोंमें समान लक्षण हों, वह अर्धसम⁵ वृत्त है। जिसके चारों चरणोंमें एक-

१. गणोंके सम्बन्धमें कुछ ज्ञातव्य बातें निम्नाङ्कित कोष्ठकसे जाननी चाहिये—

गणनाममगणयगणरगणसगणतगणजगणभगणनगण
स्वरूपSSSISSS ISIISSS IIS IS IIIII
देवतापृथ्वीजलअग्निवायुआकाशसूर्यचन्द्रमास्वर्ग
फललक्ष्मी-वृद्धिवृद्धि या अभ्युदयविनाशभ्रमणधन-नाशरोगसुयशआयु
मित्रादि संज्ञाएँमित्रभृत्यशत्रुशत्रुउदासीनउदासीनभृत्यमित्र

यदि काव्यमें ऐसे छन्दको चुना गया, जो जगण आदि अनिष्टकारी गणोंसे संयुक्त हो तो उसकी शान्तिके लिये प्रारम्भमें भगवद्वाचक एवं देवतावाचक शब्दोंका प्रयोग करना चाहिये; जैसा कि भामहका वचन है—
देवतावाचकाः शब्द ये च भद्रादिवाचकाः। ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युर्लिपितो गणतोऽपि वा ॥ (पिङ्गलसूत्रकी हलायुध-वृत्तिसे उद्धृत)
'जो देवतावाचक और मङ्गलादिवाचक शब्द हैं, वे सब लिपिदोष या गणदोषसे भी निन्दित नहीं होते।' (उनके द्वारा उक्त दोषोंका निवारण हो जाता है।)

२. यथा—

सर्वगुरुअन्त्यगुरुमध्यगुरुआदिगुरुचतुर्लघु
SSIISIS IS IIII II
१२३४५

इन भेदोंके नाम क्रमशः इस प्रकार है—कर्ण, करतल, पयोधर, वसुचरण और विष्ठ।
३. जैसे—रामं। रामः। रामस्य। यहाँ 'राम' शब्दके 'म' में ह्रस्व अकार है, तथापि उसमें अनुस्वार और विसर्गका सम्बन्ध होनेसे वह दीर्घ ही माना जाता है। इसी प्रकार 'स्य' यह संयुक्त अक्षर परे होनेसे 'रामस्य' में मकारके परवर्ती अकारको दीर्घ समझा जाता है। पादके अन्तमें जो लघु अक्षर हो, वह भी विकल्पसे 'गुरु' माना जाता है।
४. सम वृत्तका उदाहरण—
मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता।
स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥
(इस 'शिखरिणी' छन्दके चारों चरणोंमें एक समान ह्रस्व-दीर्घवाले सत्रह-सत्रह अक्षर हैं।)
५. अर्धसम वृत्तका उदाहरण—
I I I I I S I S I S S I I I I S I I S I S I S S
त्रिभुवनकमनं तमालवर्णं रविकरगौरवराम्बरं दधाने। वपुरलककुलावृताननाब्जं विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवद्या ॥
यह 'पुष्पिताग्रा' छन्द है। इसके प्रथम और तृतीय चरण एक समान लक्षणवाले बारह-बारह अक्षरके हैं। उनमें २