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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 361 of 770

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Page 361
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    ३५९

पौष्टिक कर्म, चित्रकारी तथा लेखन आदि कार्य करने चाहिये॥ २९३॥ सिंह लग्नमें ईख तथा धान्यसम्बन्धी सब कार्य, वाणिज्य (क्रय-विक्रय), हाट, कृषिकर्म तथा सेवा आदि कर्म, स्थिर कार्य, साहस, युद्ध तथा आभूषण बनाना आदि कार्य सम्पन्न होते हैं॥ २९४॥ कन्या लग्नमें विद्यारम्भ, शिल्पकर्म, ओषधिनिर्माण एवं सेवन, आभूषण-निर्माण और उसका धारण, समस्त चर और स्थिर कार्य, पौष्टिक कर्म तथा विवाहादि समस्त शुभ कार्य करने चाहिये॥ २९५॥ तुला लग्नमें कृषिकर्म, व्यापार, यात्रा, पशुपालन, विवाह-उपनयनादि संस्कार तथा तौलसम्बन्धी जितने कार्य हैं, वे सब सिद्ध होते हैं॥ २९६॥ वृश्चिक लग्नमें गृहारम्भादि समस्त स्थिर कार्य, राजसेवा, राज्याभिषेक, गोपनीय और स्थिर कर्मोंका आरम्भ करना चाहिये॥ २९७॥ धनु लग्नमें उपनयन, विवाह, यात्रा, अश्वकृत्य, गजकृत्य, शिल्पकला तथा चर, स्थिर और मिश्रित कार्योंको करना चाहिये॥ २९८॥ मकर लग्नमें धनुष बनाना, उसमें प्रत्यञ्चा बाँधना, बाण छोड़ना, अस्त्र बनाना और चलाना, कृषि, गोपालन, अश्वकृत्य, गजकृत्य तथा पशुओंका क्रय-विक्रय और दास आदिकी नियुक्ति—ये सब कार्य करने चाहिये॥ २९९॥ कुम्भ लग्नमें कृषि, वाणिज्य, पशुपालन, जलाशय, शिल्पकर्म, कला आदि, जलपात्र (कलश आदि) तथा अस्त्र-शस्त्रका निर्माण आदि कार्य करना चाहिये॥ ३००॥ मीन लग्नमें उपनयन, विवाह, राज्याभिषेक, जलाशयकी प्रतिष्ठा, गृहप्रवेश, भूषण, जलपात्रनिर्माण तथा अश्वसम्बन्धी कृत्य शुभ होते हैं॥ ३०१॥

इस प्रकार मेषादि लग्नोंके शुद्ध (शुभ स्वामीसे युक्त या दृष्ट) रहनेसे शुभ कार्य सिद्ध होते हैं। पापग्रहसे युक्त या दृष्ट लग्न हो तो उसमें केवल क्रूर कर्म ही सिद्ध होते हैं, शुभ कर्म नहीं॥ ३०२॥

वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मीन, तुला और धनु—ये शुभग्रहकी राशि होनेके कारण शुभ हैं तथा अन्य (मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर और कुम्भ—ये) पापराशियाँ हैं॥ ३०३॥ लग्नपर जैसे (शुभ या अशुभ) ग्रहोंका योग या दृष्टि हो उसके अनुसार ही लग्न अपना फल देता है। यदि लग्नमें ग्रहके योग या दृष्टिका अभाव हो तो लग्न अपने स्वभावके अनुकूल फल देता है॥ ३०४॥ किसी लग्नके आरम्भमें कार्यका आरम्भ होनेपर उसका पूर्ण फल मिलता है। लग्नके मध्यमें मध्यम और अन्तमें अल्प फल प्राप्त होता है। यह बात सब लग्नोंमें समझनी चाहिये॥ ३०५॥ कार्यकर्त्ताके लिये सर्वत्र पहले लग्नबल, उसके बाद चन्द्रबल देखना चाहिये। चन्द्रमा यदि बली हो और सप्तम भावमें स्थित हो तो सब ग्रह बलवान् समझे जाते हैं॥ ३०६॥ चन्द्रमाका बल आधार और अन्य ग्रहोंके बल आधेय हैं। आधारके बलपर ही आधेय स्थिर रहता है॥ ३०७॥ यदि चन्द्रमा शुभदायक हो तो सब ग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। यदि चन्द्रमा अशुभ हो तो अन्य सब ग्रह भी अशुभ फल देनेवाले हो जाते हैं। लेकिन धन-स्थानके स्वामीको छोड़कर ही यह नियम लागू होता है; क्योंकि यदि धनेश शुभ हो तो वह चन्द्रमाके अशुभ होनेपर भी अपने शुभ फलको ही देता है॥ ३०८॥

लग्नके जितने अंश उदित हो गये (क्षितिजसे ऊपर आ गये) हों, उनमें जो ग्रह हो वह लग्नके फलको देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि लग्नके जितने भावांश हों, उनके भीतर रहनेवाला ग्रह लग्नभावका फल देता है तथा उससे आगे-पीछे हो तो लग्नराशिमें रहता हुआ भी आगे-पीछेके भावका फल देता है। लग्नके कथित अंशसे जो ग्रह आगे बढ़ जाता है, वह द्वितीय भावका फल देता है। इस प्रकार सब भावोंमें ग्रहोंकी स्थिति और फलकी कल्पना करनी चाहिये। सब गुणोंसे युक्त लग्न तो थोड़े दिनोंमें नहीं मिल सकता; अतः स्वल्प दोष और अधिक गुणोंसे युक्त लग्नको ही सब कार्योंमें सर्वदा ग्रहण करना