Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished770 pages

Page 358 of 770

Read in context
Page 358

३५६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

मेष-संक्रान्ति हो तो अनुपम सुख और सुभिक्ष होता है तथा दोनों संध्याओंके समय हो तो वह वृष्टिका नाश करनेवाली है॥ २५४ १/२॥

(करण-संक्रान्तिवश सूर्यके वाहन-भोजनादि—) बव आदि ग्यारह करणोंमें संक्रान्ति होनेपर क्रमशः १ सिंह, २ बाघ, ३ सूअर, ४ गदहा, ५ हाथी, ६ भैंसा, ७ घोड़ा, ८ कुत्ता, ९ बकरा, १० बैल और ११ मुर्गा—ये सूर्यके वाहन होते हैं तथा १ भुशुण्डी, २ गदा, ३ तलवार, ४ लाठी, ५ धनुष, ६ बरछी, ७ कुन्त (भाला), ८ पाश, ९ अंकुश, १० अस्त्र (जो फेंका जाता है) और ११ बाण—इन्हें क्रमशः सूर्यदेव अपने हाथोंमें धारण करते हैं। १ अन्न, २ खीर, ३ भिक्षान्न, ४ पकवान, ५ दूध, ६ दही, ७ मिठाई, ८ गुड़, ९ मधु, १० घृत और ११ चीनी—ये बव आदिकी संक्रान्तिमें क्रमशः भगवान् सूर्यके हविष्य (भोजन) होते हैं॥ २५५—२५७ १/२॥

(सूर्यकी स्थिति—) बव, वणिज, विष्टि, बालव और गर—इन करणोंमें सूर्य बैठे हुए, कौलव, शकुनि और किंस्तुघ्न—इन करणोंमें खड़े हुए तथा चतुष्पद, तैतिल और नाग—इन तीन करणोंमें सोते हुए, संक्रान्ति करते (एक राशिसे दूसरी राशिमें जाते) हों तो इन तीनों अवस्थाओंकी संक्रान्तिमें प्रजाको क्रमशः धर्म, आयु और वर्षाके विषयमें समान, श्रेष्ठ और अनिष्ट फल प्राप्त होते हैं तथा ऊपर कहे हुए अस्त्र, वाहन और भोजन तथा उससे आजीविका या व्यवहार करनेवाले मनुष्यादि प्राणियोंका अनिष्ट होता है एवं जिस प्रकार सोये, बैठे, खड़े हुए संक्रान्ति होती है, उसी प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए प्राणियोंका अनिष्ट होता है॥ २५८—२६० १/२॥

**नक्षत्रोंकी अन्धाक्षादि संज्ञाएँ—*रोहिणी नक्षत्रसे आरम्भ करके चार-चार नक्षत्रोंको क्रमशः अन्ध, मन्दनेत्र, मध्यनेत्र और सुलोचन माने और पुनः आगे इसी क्रमसे सूर्यके नक्षत्रतक गिनकर नक्षत्रोंकी अन्ध आदि चार संज्ञाएँ समझे।

(संक्रान्तिकी विशेष संज्ञा—) स्थिर राशियों (वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ)-में सूर्यकी संक्रान्तिका नाम 'विष्णुपदी', द्विस्वभाव राशियों (मिथुन, कन्या, धनु और मीन)-में 'षडशीतिमुखा', तुला और मेषमें 'विषुव' (विषुवत्), मकरमें 'सौम्यायन' और कर्कमें 'याम्ययन' संज्ञा होती है॥ २६१—२६३ १/२॥

(पुण्यकाल—) याम्ययन और स्थिर राशियोंकी (विष्णुपद) संक्रान्तिमें संक्रान्तिकालसे पूर्व १६ घड़ी, द्विस्वभाव राशियोंकी षडशीतिमुखा और सौम्यायन-संक्रान्तिमें संक्रान्तिकालके पश्चात् १६ घड़ी तथा विषुवत् (मेष, तुला) संक्रान्तिमें मध्य (संक्रान्ति-कालसे ८ पूर्व और ८ पश्चात्)-की १६ घड़ीका समय पुण्यदायक होता है॥ २६४॥

सूर्योदयसे पूर्वकी तीन घड़ी प्रातः-संध्या तथा सूर्यास्तके बादकी तीन घड़ी सायं-संध्या कहलाती है। यदि सायं-संध्यामें याम्ययन या सौम्यायन कोई संक्रान्ति हो तो पूर्व दिनमें और प्रातः-संध्यामें संक्रान्ति हो तो पर दिनमें सूर्योदयके बाद पुण्यकाल होता है॥ २६५॥

जब सूर्यकी संक्रान्ति होती है, उस समय प्रत्येक मनुष्यके लिये जैसा शुभ या अशुभ चन्द्रमा होता है, उसीके अनुसार इस महीनेमें मनुष्योंको चन्द्रमाका शुभ या अशुभ फल प्राप्त होता है॥ २६६॥

*नीचे चक्रमें स्पष्ट देखिये—

अन्धाक्षरोहिणीपुष्यउत्तराफाल्गुनीविशाखापूर्वाषाढ़धनिष्ठारेवती
मन्दाक्षमृगशिराआश्लेषाहस्तअनुराधाउत्तराषाढ़शतभिषाअश्विनी
मध्याक्षआर्द्रामघाचित्राज्येष्ठाअभिजित्पूर्व भाद्रपदभरणी
सुलोचनपुनर्वसुपूर्वाफाल्गुनीस्वातीमूलश्रवणउत्तर भाद्रपदकृत्तिका