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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 327 of 770

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Page 327
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * । ३२५

पुत्र और स्त्रीसे सम्पन्न तथा शनिकी राशि (मकर-कुम्भ)-में हो तो ऋणी होता है॥ २२७ १/२ ॥

गुरु यदि सिंहमें हो तो सेनापति, कर्कमें हो तो स्त्री-पुत्रादिसे युक्त एवं धनी, मङ्गलकी राशि (मेष-वृश्चिक)-में हो तो धनी और क्षमाशील, बुधकी राशि (मिथुन-कन्या)-में हो तो वस्त्रादि विभवसे युक्त, अपनी राशि (धनु-मीन)-में हो तो मण्डल (जिला)-का मालिक, शुक्रकी राशि (वृष-तुला)-में हो तो धनी और सुखी तथा शनिकी राशि (मकर-कुम्भ)-में हो तो मकरमें ऋणवान् और कुम्भमें धनवान् होता है॥ २२८ १/२ ॥

शुक्र सिंहमें हो तो जातक स्त्रीद्वारा धन-लाभ करनेवाला, कर्कमें हो तो घमण्ड और शोकसे युक्त, मङ्गलकी राशि (मेष-वृश्चिक)-में हो तो बन्धुओंसे द्वेष रखनेवाला, बुधकी राशि (मिथुन-कर्क)-में हो तो धनी और पापस्वभाव, गुरुकी राशि (धनु-मीन)-में हो तो धनी और पण्डित, अपनी राशि (वृष-तुला)-में हो तो धनवान् और क्षमावान् तथा शनिकी राशि (मकर-कुम्भ)-में हो तो स्त्रीसे पराजित होता है॥ २२९ १/२ ॥

शनि यदि सिंहमें हो तो पुत्र और धनसे रहित, कर्कमें हो तो धन और संतानसे हीन, मङ्गलकी राशि (मेष-वृश्चिक)-में हो तो निर्बुद्धि और मित्रहीन, बुधकी राशि (मिथुन-कन्या)-में हो तो प्रधान रक्षक, गुरुकी राशि (धनु-मीन)-में हो तो सुपुत्र, उत्तम स्त्री और धनसे युक्त, शुक्रकी राशि (वृष-तुला)-में हो तो राजा और अपनी राशि (मकर-कुम्भ)-में हो तो जातक ग्रामका अधिपति होता है॥ २३० १/२ ॥

(चन्द्रपर दृष्टिका फल—) मेषस्थित चन्द्रमापर मङ्गल आदि ग्रहोंकी दृष्टि हो तो जातक क्रमसे राजा, पण्डित, गुणवान्, चोर-स्वभाव तथा निर्धन* होता है॥ २३१॥

वृषस्थ चन्द्रमापर मङ्गल आदि ग्रहोंकी दृष्टि हो तो क्रमसे निर्धन, चोर-स्वभाव, राजा, पण्डित तथा प्रेष्य (भृत्य) होता है। मिथुनराशिमें स्थित चन्द्रमापर मङ्गल आदि ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मनुष्य क्रमशः धातुओंसें आजीविका करनेवाला, राजा, पण्डित, निर्भय, वस्त्र बनानेवाला तथा धनहीन होता है। अपनी राशि (कर्क)-में स्थित चन्द्रमापर यदि मङ्गलादि ग्रहोंकी दृष्टि हो तो जन्म लेनेवाला शिशु क्रमशः योद्धा, कवि, पण्डित, धनी, धातुसे जीविका करनेवाला तथा नेत्ररोगी होता है। सिंहराशिस्थ चन्द्रमापर यदि बुधादि ग्रहोंकी दृष्टि हो तो मनुष्य क्रमशः ज्योतिषी, धनवान्, लोकमें पूज्य, नाई, राजा तथा नरेश होता है। कन्या-राशिस्थित चन्द्रमापर बुध आदि ग्रहोंकी दृष्टि हो तो शुभग्रहों (बुध, गुरु, शुक्र)-की दृष्टि होनेपर जातक क्रमशः राजा, सेनापति एवं निपुण होता है और अशुभ (शनि, मङ्गल, रवि)-की दृष्टि होनेपर स्त्रीके आश्रयसे जीविका करनेवाला होता है। तुला-राशिस्थ चन्द्रमापर यदि बुध आदि (बुध, गुरु, शुक्र)-की दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रमसे भूपति, सोनार और व्यापारी होता है तथा शेषग्रह (शनि, रवि और मङ्गल)-की दृष्टि होनेपर वह हिंसाके स्वभाववाला होता है॥ २३२-२३४॥

वृश्चिक-राशिस्थ चन्द्रमापर बुध आदि ग्रहोंकी दृष्टि होनेपर क्रमसे जातक दो संतानका पिता, मृदुस्वभाव, वस्त्रादिकी रँगाई करनेवाला, अङ्गहीन, निर्धन और भूमिपति होता है। धन-राशिस्थ चन्द्रमापर बुध आदि शुभग्रहोंकी दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रमशः अपने कुल, पृथ्वी तथा जनसमूहका पालक होता है। शेष ग्रहों (शनि, रवि तथा मङ्गल)-की दृष्टि हो तो जातक दम्भी


*मङ्गलकी दृष्टिसे भूप, बुधकी दृष्टिसे ज्ञ (पण्डित), गुरुकी दृष्टिसे गुणी, शुक्रकी दृष्टिसे चोर-स्वभाव तथा शनिकी दृष्टिसे अस्व (निर्धन) कहा गया है। सूर्यकी दृष्टिका फल अनुक्त होनेके कारण उसे शनिके ही तुल्य समझना चाहिये।