संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 321 of 770
Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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(१०, २, ८, १, ७, ४, ११) स्थानोंमें; सूर्यसे ३, ९ सहित पूर्वोक्त (१०, २, ८, १, ७, ४, ११) स्थानोंमें; शुक्रसे ५, २, ९, १०, ११, ६ में; चन्द्रमासे २, ११, ५, ९, ७ में; शनिसे ५, ३, ६, १२में; बुधसे ९, ४, ५, ६, २, १०, १, ११ में तथा लग्नसे ७ सहित पूर्वोक्त (९। ४, ५, ६, २, १०, १, ११) स्थानोंमें शुभ होता है ॥ १५९-१६० ॥
शुक्र लग्नसे १, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९ स्थानोंमें; चन्द्रमासे भी इन्हीं स्थानों (१, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९)-में और १२ वें स्थानमें; अपने आश्रित स्थानसे १० सहित उक्त (१, २, ३, ४, ५, ११, ८, ९) स्थानोंमें; शनिसे ३, ५, ९, ४, १०, ८, ११ स्थानोंमें; सूर्यसे ८, ११, १२ स्थानोंमें; गुरुसे ९, ८, ५, १०, ११ स्थानोंमें; बुधसे ५, ३, ११, ६, ९ स्थानोंमें और मङ्गलसे ३, ६, ९, ५, ११ तथा बारहवें स्थानोंमें शुभ होता है ॥ १६१-१६२ ॥
शनि अपने आश्रित स्थानसे ३, ५, ११, ६ में; मङ्गलसे १०, १२ सहित पूर्वोक्त (३, ५, ११, ६) स्थानोंमें; सूर्यसे १, ४, ७, १०, ११, ८, २ में; लग्नसे ३, ६, १०, ११, १, ४ में; बुधसे ९, ८, ११, ६, १०, १२ में; चन्द्रमासे ११, ३, ६ में; शुक्रसे ६, ११, १२ में और गुरुसे ५, ११, ६ स्थानोंमें शुभ होता है ॥ १६३-१६४ ॥
उपर्युक्त स्थानोंमें ग्रह रेखा-प्रद और अनुक्त स्थानोंमें बिन्दुप्रद होते हैं*। जो ग्रह लग्न या चन्द्रमासे वृद्धि या उपचय स्थान (३, ६, १०, ११) में हों, या अपने मित्रगृहमें, उच्च स्थानमें तथा स्वराशिमें स्थित हों, उनके द्वारा शुभ फलकी अधिकता होती है और इनसे भिन्न स्थानोंमें जो ग्रह हों, उनके द्वारा अशुभ फलोंकी अधिकता होती है ॥ १६५ ॥
( एकादि रेखावाले स्थानका फल— ) उक्त प्रकारसे जिस स्थानमें एक रेखा हो, वहाँ ग्रहके जानेपर कष्ट होता है। दो रेखावाले स्थानमें जानेसे धनका नाश होता है। तीन रेखावालेमें जानेसे क्लेश होता है। चार रेखावाले स्थानमें ग्रहके पहुँचनेसे मध्यम फल होता है (शुभ-अशुभ फलकी तुल्यता होती है)। पाँच रेखावाले स्थानमें सुखकी प्राप्ति, छः रेखावालेमें धनका लाभ, सात रेखावाले स्थानमें सुख तथा आठ रेखावाले स्थानमें चारवश ग्रहके जानेपर अभीष्ट फलकी सिद्धि होती है ॥ १६६ ॥
( आजीविका-कथन— ) जन्मकालिक लग्न और चन्द्रमासे १०वें स्थानमें यदि सूर्य आदि ग्रह हों तो क्रमसे पिता-माता, शत्रु, मित्र, भाई, स्त्री और नौकरके द्वारा धनका लाभ होता है। जन्मलग्न, जन्मकालिक चन्द्र तथा जन्मकालिक सूर्य—इन
*बालकके जन्मकालमें जो ग्रहस्थिति है, उसमें ग्रहकी निजाश्रित राशिसे विचार करके इस प्रकार रेखा और बिन्दु का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अर्थात् इस तरह रेखा और बिन्दु लगानेसे जिस स्थानमें अधिक रेखाकी संख्या हो,
सूर्यका अष्टकवर्ग-चक्र देखिये—
| स्थान / भाव | राशि व ग्रह | रेखा / बिन्दु |
|---|---|---|
| प्रथम भाव | १ शु. | ००।००।०। |
| द्वितीय भाव | २ मं. | ॥।००।॥ |
| तृतीय भाव | ३ | ०॥०।००। |
| चतुर्थ भाव | ४ चं. | ००।००।० |
| पंचम भाव | ५ | ॥००।०।० |
| षष्ठ भाव | ६ श. | ।०॥०।०। |
| सप्तम भाव | ७ गु. | ।०॥०००। |
| अष्टम भाव | ८ | ॥०००।० |
| नवम भाव | ९ | ॥।००॥। |
| दशम भाव | १० | ०।०००।० |
| एकादश भाव | ११ | ॥००।०।० |
| द्वादश भाव | १२ बु. | ।॥॥००० |
उस स्थानमें चारवश ग्रहके जानेसे शुभ फल होता है और जिसमें बिन्दु की संख्या अधिक हो, उस स्थानमें ग्रहके जानेसे अशुभ फलकी प्राप्ति होती है।
यहाँ रेखा और बिन्दु लगाकर सूर्यका अष्टकवर्ग-चक्र अङ्कित किया गया है। इसमें वृष, कन्या, धनु और मीनमें रेखा अधिक होनेके कारण ये राशियाँ शुभ हैं तथा मिथुन, सिंह, तुला और कुम्भमें रेखा और बिन्दु तुल्य होनेके कारण ये मध्यम हैं एवं शेष कर्क, वृश्चिक, मकर और मेष—ये अधिक बिन्दु होनेके कारण अशुभ हैं।