संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३१५
पिण्डायुके प्रमाण होते हैं तथा २०, १, २, ९, १८, २०, ५० ये क्रमशः सूर्यादि ग्रहोंके निसर्गायुर्दायके प्रमाण होते हैं ॥ १२०-१२१ ॥
पिण्डायु और निसर्गायुमें आयु-साधन करना हो तो राश्यादि ग्रहमें अपने उच्चको घटाना चाहिये। यदि वह ६ राशिसे अल्प हो तो उसको १२ राशिमें घटाकर ग्रहण करें। उसके अंश बनानेसे वह आयुर्दाय-साधनमें उपयोगी होता है। जो ग्रह शत्रुके गृहमें हो उसके अंशोंमें उसीका तृतीयांश घटावे। यदि वह ग्रह वक्रगति न हो तभी ऐसा करना चाहिये। (यदि ग्रह वक्रगति हो तो शत्रुगृहमें रहनेपर भी तृतीयांश नहीं घटाना चाहिये) तथा शनि और शुक्रको छोड़कर अन्य ग्रह अस्त हों तो उनके अंशोंमें आधा घटा देना चाहिये। (शनि और शुक्र अस्त हों तो भी उनके अंशोंमें आधा नहीं घटाना चाहिये।) यदि किसी ग्रहमें दोनों हानि प्राप्त हो (अर्थात् वह शत्रुगृहमें हो और अस्त भी हो) तो उसमें अधिक हानिमात्र करें (अर्थात् केवल आधा घटावे, तृतीयांश नहीं)। यदि लग्नमें पापग्रह हो तो उसकी राशिको छोड़कर केवल अंशादिसे आयुर्दायके अंशको गुणा करके गुणनफलमें ३६० का भाग देकर लब्ध अंशादिको पूर्वोक्त अंशमें घटावे। इस प्रकार पापग्रहके समस्त लब्धांश घटावे। यदि उसमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो लब्धांशका आधा घटाना चाहिये। इस तरह आगे बताये जानेवाले प्रकारसे आयुर्दाय-साधन योग्य स्पष्ट अंश उपलब्ध होते हैं ॥ १२२-१२५ ॥
(पिण्डायु-साधन -) उन स्पष्टांशोंको अपने-अपने पूर्वोक्त गुणक (उच्चस्थ वर्ष-संख्या १९ आदि)-से गुणा करके गुणनफलमें ३६० से भाग देनेपर लब्धि वर्ष-संख्या होती है। शेषको १२ से गुणा करके ३६० से भाग देनेपर लब्धि मास-संख्या होती है। पुनः शेषको ३० से गुणा करके ३६० के द्वारा भाग देनेपर लब्धि दिन-संख्या होगी। फिर शेषको ६० से गुणा कर ३६० से भाग देनेपर लब्धि घटी एवं पलादि रूप होगी ॥ १२६-१२७ ॥
(लग्नायु-साधन-) लग्नकी राशियोंको छोड़कर अंशादिको कला बनाकर २०० से भाग देनेपर लब्धि वर्ष-संख्या होगी। शेषको १२ से गुणाकर २०० से भाग देनेपर लब्धि मास-संख्या होगी। पुनः पूर्ववत् ३० आदिसे गुणा करके हरसे भाग देनेपर लब्धि दिनादिकी सूचक होगी ॥ १२८ ½ ॥
१. यदि लग्न-राश्यादि ३ । १५ । २० । ३० और स्पष्ट सूर्य १० । १५ । १० । २० है तो उपर्युक्त रीतिके अनुसार सूर्यकी राश्यादिमें सूर्यकी उच्च राश्यादि ० । १० को घटानेपर १० । ५ । १० । २० रहा। यह ६ राशिसे अधिक है, इसलिये इसीको अंशात्मक बनानेसे ३०५ । १० । २० हुआ। सूर्य शत्रुके घरमें नहीं है, इसलिये इसमें संस्कार-विशेष न करके इसी अंशादिको सूर्यके उच्चस्थानीय आयुमान १९ से गुणा करनेपर गुणनफल ५७९८ । १६ । २० में ३६० का भाग देनेपर लब्ध वर्ष १६ हुए। शेष ३८ । १६ । २० को १२ से गुणा कर गुणनफल ४५९ । १६ । ० में ३६० का भाग देनेपर लब्ध मास १ हुआ। मास-शेष ९९ । १६ को ३० से गुणा करनेपर गुणनफल २९७६ में ३६० का भाग देनेपर लब्ध दिन ८ हुए। शेष ९६ को ६० से गुणा करके गुणनफल ५७६० में ३६० का भाग देनेपर लब्धि घड़ी १६ हुई; शेष ० रहा। इस प्रकार सूर्यसे आयुमान वर्षादि १६ । १ । ८ । १६ । ० हुआ। इसी तरह सब ग्रहोंका आयु-साधन कर लेना चाहिये।
ग्रहोंका उच्चादिबोधक चक्र
| ग्रह | सूर्य | चन्द्र | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उच्चराशि | ० | १ | ९ | ५ | ३ | ११ | ६ |
| " अंश | १० | ३ | २८ | १५ | ५ | २७ | २० |
| नीचराशि | ६ | ७ | ३ | ११ | ९ | ५ | ० |
| " अंश | १० | ३ | २८ | १५ | ५ | २७ | २० |
| आयु-पिण्ड | १९ | २५ | १५ | १२ | १५ | २१ | २० |
२. लग्नायु-साधन-लग्नकी राशिको छोड़कर अंशादि १५ । २० । ३० को कलात्मक बनानेसे ९२० । ३० हुआ। इसमें २०० का भाग देनेपर लब्ध वर्ष ४ हुए। शेष १२० । ३० को १२ से गुणा करनेपर गुणनफल १४४६ । ० में २०० का