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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 295 of 770

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Page 295
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २९३

लब्धि-अङ्क अङ्गुलादि 'शर' होता है॥ १५० ३/९ ॥<br>सूर्यको चन्द्रमा और चन्द्रमाको भूभा (पृथिवीकी छाया) छादित करती है। इसलिये सूर्यग्रहणमें सूर्य छाद्य और चन्द्रमा छादक तथा चन्द्रग्रहणमें चन्द्रमा छाद्य, भूभा छादक (ग्रहणकर्त्री) है—ऐसा समझना चाहिये। अब छन्न (ग्रास) मानकहते हैं—छाद्य और छेदकके बिम्बमानका योग करके उसके आधेमें 'शर' घटानेसे 'छन्न' (ग्रास) मान होता है। यदि ग्रासमान ग्राह्य (छाद्य)-से अधिक हो तो उसमें छाद्यको घटाकर जो शेष बचे, उतना खच्छन्न (खग्रास) समझना चाहिये¹।<br>मानैक्यार्ध (छाद्य-छादकके बिम्ब-योगार्ध)

उपरी भागमें सूर्यकी किरणें पड़ती हैं (नीचेके भागमें जिसे हम देखते हैं, नहीं)। यही कारण है कि अमावास्याके दिन हमें चन्द्रमाका दर्शन नहीं होता है। रात्रिमें सूर्यके साथ ही चन्द्रमा भी पृथिवीके नीचे चला जाता है।

जिस अमावास्याको पृथ्वी और सूर्यके मध्यमें चन्द्रमा आ जाता है, उस दिन उससे आच्छादित होकर सूर्यका बिम्ब अदृश्य हो जाता है; ठीक उसी तरह, जैसे मेघोंके खण्डसे आवृत होनेपर वह अदृश्य होता है। इस प्रकार चन्द्रबिम्बसे जब सूर्यका सम्पूर्ण या न्यूनाधिक भाव अदृश्य होता है तो क्रमशः उसे 'सर्वग्रास' या 'खण्ड सूर्यग्रहण' कहते हैं।

अमावास्यामें चन्द्रमाकी छाया पृथिवीकी ओर होती है, उस छायामें जो भूभाग पड़ता है, उसके लिये सम्पूर्ण सूर्य-बिम्ब अदृश्य हो जाता है, अतः वहाँ सर्वग्रास सूर्यग्रहण होता है; अन्यत्र खण्ड-ग्रास। चित्र देखिये।

पुराणोंमें जो सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणमें राहु कारण बतलाया गया है, वह इस अभिप्रायसे है—अमृत-मन्थनके समय जब राहुका सिर काटकर अलग कर दिया गया, उस समय अमृत पीनेके कारण उसका मरण नहीं हुआ। वह एकसे दो हो गया। ब्रह्माजीने उन दोनोंमेंसे एक (राहु)-को चन्द्रमाकी छायामें और दूसरे (केतु)-को पृथिवीकी छायामें रहनेके लिये स्थान दिया। अतः ग्रहण-समयमें राहु और केतु सूर्य और चन्द्रमाके समीप ही रहता है। अतः छायारूप राहु-केतुके द्वारा ही ग्रहणका वर्णन किया गया है।

१. मान लीजिये—पूर्णिमान्तकाल घट्यादि ४०।४८ और उस समयका स्पष्ट सूर्य राश्यादि ८।०।१२।६, चन्द्रमा २।०।१२।१ तथा राहु ७।२८।२३।१८ है तो स्पष्ट सूर्य ८।०।१२।६ में राहु ७।२८।२३।१८ को घटानेसे ०।१।४८।४८ व्यगु हुआ; यह ३ राशिसे कम है, अतः इसका भुजांश इतना ही अर्थात् १।४८।४८ हुआ। यह १४ अंशसे कम है, इसलिये ग्रहणकी सम्भावना निश्चित हुई। व्यगुके भुजांश १।४८।४८। को ११ से गुणा करके गुणनफल १९।५६।४८ में ७ का भाग देनेपर भागफल २।५०। 'शर' हुआ। यह व्यगुके उत्तर गोलमें होनेके कारण उत्तर दिशाका हुआ।

यहाँ श्रीसनन्दन मुनिने चन्द्रादिके मध्यम बिम्ब प्रसिद्ध होनेसे स्पष्ट बिम्बका साधन-प्रकार नहीं कहा है। अतः सरलतापूर्वक समझनेके लिये चन्द्र, रवि और भूभा (पृथिवीकी छाया) के बिम्ब-साधनका प्रकार यहाँ दिखलाया जाता है।

गतिर्द्विघ्नीशासाङ्कुलमुखतनुः स्यात् खररुचो
विधोर्भुक्तिर्वेदाद्रिभिरपहृता बिम्बमुदितम्।
नृपाश्वोना चान्द्रीगतिरपहृता लोचनकरै-
रदाढ्या भूभा स्याद्दिनगतिनगांशेन रहिता॥