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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 274 of 770

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Page 274
२७२* संक्षिप्त नारदपुराण *

सर्वधन होता है^१॥ ४२-४३ ॥
भुजकोटिकृतेर्योगमूलं कर्णश्च दोर्भवेत्।
श्रुतिकोटिकृतेरन्तः पदं दोःकर्णवर्गयोः ॥ ४४ ॥
विवराद् यत्पदं कोटिः क्षेत्रे त्रिचतुरस्रके।
राश्योरन्तरवर्गेण द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥ ४५ ॥
वर्गयोगोऽथ योगान्तर्हतिर्वर्गान्तरं भवेत्।
(क्षेत्रव्यवहार-प्रकरण)—भुज और कोटिके वर्गयोगका मूल कर्ण होता है, भुज और कर्णके वर्गान्तरका मूल कोटि होता है तथा कोटि एवं कर्णके वर्गान्तरका मूल भुज होता है—यह बात त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रके लिये कही गयी है^२। अथवा राशिके अन्तरवर्गमें उन्हीं दोनों राशियोंका द्विगुणित घात (गुणनफल) जोड़ दें तो वर्गयोग होता है अथवा उन्हीं दोनों राशियोंके योगान्तरका घात वर्गान्तर होता है^३॥ ४४-४५\frac{१}{२}॥


१. कल्पना कीजिये कि किसी दाताने किसी याचकको पहले दिन २ रुपये देकर उसके बाद प्रतिदिन द्विगुणित करके देनेका निश्चय किया तो बताइये कि उसने ३० दिनमें कितने रुपये दान किये।
उत्तर—यहाँ आदि=२, गुणात्मकचय=२, पद=३० है। पद सम अंक है। अतः आधा करके १५ के स्थानमें वर्गचिह्न लगाया, यह विषमाङ्क हुआ, अतः उसमें १ घटाकर १४ के स्थानमें गुणकचिह्न लिखा। फिर यह सम हो गया, अतः आधा ७ करके वर्गचिह्न किया, इस प्रकार पद-संख्याकी समाप्तिपर्यन्त न्यास किया। न्यास देखिये—

न्यास—

१५ वर्ग१०७३७४१८२४
१४ गुण३२७६८
७ वर्ग१६३८४
६ गुण१२८
३ वर्ग६४
२ गुण८
१ वर्ग४
० गुण२

अन्तमें गुणचिह्न हुआ। वहाँ गुणकाङ्क २ को रखकर उलटा प्रथम चिह्नतक गुणक-वर्गज फल-साधन किया तो १०७३७४१८२४ हुआ।
इसमें एक घटाकर एकोनगुण (१)-से भाग देकर आदि (२)-से गुणा किया तो २,१४,७४,८३,६४६ रुपये सर्वधन हुआ।

२. लीलावती (क्षेत्रव्यवहार श्लोक १, २)-में इस विषयको इस प्रकार स्पष्ट किया है—‘त्रिभुज या चतुर्भुजमें जब एक भुजपर दूसरा भुज लम्बरूप हो, उन दोनोंमें एक (नीचेकी पड़ी रेखा)-को ‘भुज’ और दूसरी (ऊपरकी खड़ी रेखा)-को ‘कोटि’ कहते हैं। तथा उन दोनोंके वर्गयोग मूलको ‘कर्ण’ कहते हैं। भुज और कर्णका वर्गान्तर मूल कोटि तथा कोटि और कर्णका वर्गान्तर मूल भुज होता है। यथा—‘क, ग, च’ यह एक त्रिभुज है। ‘क, ग’ इस रेखाको कोटि कहते हैं। ‘ग, च’ इस रेखाका नाम भुज है, ‘क, च’ का नाम कर्ण है।

    क
    |\
    | \
    |  \
    |   \
    |    \
    |_____\
   ग       च

उदाहरण—जैसे प्रश्न हुआ कि जिस जात्य त्रिभुजमें कोटि=४, भुज=३ है वहाँका कर्णमान क्या होगा? तथा भुज और कर्ण जानकर कोटि बताओ और कोटि, कर्ण जानकर भुज बताओ।

उक्त रीतिसे ४ का वर्ग १६ और ३ का वर्ग ९, दोनोंके योग २५ का मूल ५ यह कर्ण हुआ। एवं कर्ण ५ और भुज ३, इन दोनोंके वर्गान्तर २५-९=१६, इसका मूल ४ कोटि हुई तथा कर्णके वर्ग २५ में कोटिके वर्ग १६ को घटाकर शेष ९ का मूल ३ भुज हुआ।
इसी प्रकार सर्वत्र जानना चाहिये।
३. जैसे ३ और ४ ये दो राशियाँ हैं। इन दोनोंके दूने गुणनफलमें ३×४×२=२४ में दोनों राशियोंका अन्तर वर्ग (४-३)²=(१)²=१ मिलानेसे २४+१=२५ यह दोनों राशियोंके वर्गयोग (३)²+(४)²=९+१६=२५ के बराबर है तथा उन्हीं दोनों राशियोंके योगान्तर घात (३+४)×(४-३)=७×१=७ यह दोनों राशियोंके वर्गान्तर १६-९=७ के बराबर है। (^२यह निशान वर्गका है।