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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 240 of 770

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Page 240

२३८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

राधाका अर्थ है भगवान् श्रीकृष्णकी आह्लादिनी शक्ति, जो उनकी भी आराध्या होनेसे 'राधा' कहलाती हैं१। सर्वाका अर्थ है सब२ (स्त्री)। 'गतिः' का अर्थ है—गमन, मोक्ष, प्राप्ति या ज्ञान३। 'गोपी' शब्द प्रेम-भक्तिकी आचार्यरूपा गोपियोंका वाचक४ है। स्त्रीका अर्थ है नारी५। 'श्री' शब्द लक्ष्मीका वाचक है६। धेनुका अर्थ दूध देनेवाली गाय है७। वधूका अर्थ है जाया अथवा पुत्रवधू८। स्वसा९ कहते हैं बहिनको। गो-शब्दका रूप स्त्रीलिङ्गमें भी पुँल्लिङ्गके समान होता है। नौ-शब्दका रूप पहले दिया जा चुका है। उपानह्१० शब्द जूतेका वाचक है। द्यौ११ स्वर्गका वाचक है।

ककुभ्१२ शब्द दिशाका वाचक है। संविद्१३-शब्द बुद्धि एवं ज्ञानका वाचक है ॥४०॥

रुग्विडुद्भाः स्त्रियां तपः कुलं सोमपमक्षि च।
ग्रामण्यम्बु खलप्वेवं कर्तृ चातिरि वातिनु ॥४१॥

रुक्१४ नाम है रोगका। विट्१५-शब्द वैश्यका वाचक है। उद्भाः१६का अर्थ है उत्तम प्रकाश या प्रकाशित होनेवाली। ये शब्द स्त्री-लिङ्गमें प्रयुक्त होते हैं।

अब नपुंसकलिङ्ग शब्दोंका परिचय देते हैं। तपस्१७-शब्द तपस्याका वाचक है। कुल१८-शब्द वंश या समुदायका वाचक है। सोमप१९-शब्दका अर्थ है सोमपान करनेवाला। 'अक्षि'का२० अर्थ है


१. इसके रूप यों हैं—राधा राधे राधाः। राधाम् राधे राधाः। राधया राधाभ्याम् राधाभिः। राधायै राधाभ्याम् राधाभ्यः। राधायाः राधाभ्याम् राधाभ्यः। राधायाः राधयोः राधानाम्। राधायाम् राधयोः राधासु। हे राधे हे राधे हे राधाः। २. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं। चतुर्थीके एकवचनमें—सर्वस्यै। पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें—सर्वस्याः। षष्ठीके बहुवचनमें—सर्वासाम्। सप्तमीके एकवचनमें—सर्वस्याम्। शेष सभी रूप 'राधा' शब्दकी ही भाँति होंगे। ३. गति शब्दके रूप यों समझने चाहिये—गतिः गती गतयः। गतिम् गती गतीः। गत्या गतिभ्याम् ३ गतिभिः। गत्यै गतये गतिभ्यः २। गत्याः २ गतेः २। गत्योः २ गतीनाम्। गत्याम् गतौ गतिषु। हे गते हे गती हे गतयः। ४. गोपी-शब्दके रूप इस प्रकार हैं—गोपी गोप्यौ २ गोप्यः। गोपीम् गोपीः। गोप्य गोपीभ्याम् ३ गोपीभिः। गोप्यै गोपीभ्यः २। गोप्यः २ गोप्योः २ गोपीनाम्। गोप्याम् गोपीषु। हे गोपि हे गोप्यौ हे गोप्यः। ५. इस शब्दके रूप इस प्रकार हैं—स्त्री स्त्रियौ २ स्त्रियः। स्त्रियम् स्त्रीम् स्त्रियः स्त्रीः। स्त्रिया स्त्रीभ्याम् ३। स्त्रीभिः। स्त्रियै स्त्रीभ्यः २। स्त्रियाः २। स्त्रियोः २ स्त्रीणाम्। स्त्रियाम् स्त्रीषु। हे स्त्रि हे स्त्रियौ हे स्त्रियः। ६. उसके रूप इस प्रकार हैं—श्रीः श्रियौ २ श्रियः २। श्रियम्। श्रिया श्रीभ्याम् ३ श्रीभिः। श्रियै श्रिये श्रीभ्यः २। श्रियाः २। श्रियः २। श्रियोः २ श्रीणाम् श्रियाम्। श्रियाम् श्रियि श्रीषु। हे श्रीः हे श्रियौ हे श्रियः। ७. इसके रूप गति शब्दकी तरह होंगे। यथा—धेनुः धेनू धेनवः। धेन्वै धेनवे इत्यादि। ८. इस शब्दके रूप इस प्रकार है—वधूः वध्वौ वध्वः। शेष रूप गोपी-शब्दकी तरह समझने चाहिये। वहाँ 'ई' के स्थानमें 'य्' होता है, यहाँ 'ऊ' के स्थानमें 'व्' होगा। इतना ही अन्तर है। ९. इसके रूप कर्तृ-शब्दके समान होते हैं। केवल द्वितीयाके बहुवचनमें 'स्वसृः' ऐसा रूप होता है—इतना ही अन्तर है। १०. उसके रूप इस प्रकार हैं—उपानत् उपानद् उपानहौ २ उपानहः २। उपानहम्। उपानहा उपानद्भ्याम् ३ उपानद्भिः। उपानहे उपानद्भ्यः २। उपानहः २। उपानहोः २ उपानहाम्। उपानहि उपानत्सु। ११. दिव्-शब्दके रूप गो-शब्दके समान समझने चाहिये। १२. इसके रूप—ककुप् ककुब् ककुभौ २ ककुभः २। ककुभम्। ककुभा ककुब्भ्याम् इत्यादि है। सप्तमीके बहुवचनमें ककुप्सु रूप होता है। १३. इसके रूप—संवित् संविद् संविदौ संविदः इत्यादि हैं। १४. इसके रूप हैं—रुक् रुग् रुजौ २ रुजः २। रुजम्। रुजा रुग्भ्याम् इत्यादि। १५. इसके रूप हैं—विट् विड् विशौ विशः इत्यादि। १६. इसके रूप है—उद्भाः उद्भासौ उद्भासः इत्यादि। १७. नपुंसकलिङ्गमें प्रथमा और द्वितीया विभक्तिके रूप एकसे ही होते हैं और तृतीयासे लेकर सप्तमीतकके रूप पुँल्लिङ्गके समान होते हैं। तपस्-शब्दके रूप इस प्रकार समझने चाहिये—तपः तपसी तपांसि। ये तीनों रूप प्रथमा और द्वितीया विभक्तिमें प्रयुक्त होते हैं। शेष रूप उशनस्के समान होंगे। १८. रूप ये हैं—कुलम् कुले कुलानि। शेष रामवत्। १९. प्रथमा-द्वितीया विभक्तियोंमें इसके रूप हैं—सोमपम् सोमपे सोमपानि। शेष रामवत्। २०. इसके रूप प्रथम दो विभक्तियोंमें हैं—अक्षि अक्षिणी अक्षीणि। शेष पाँच विभक्तियोंके एकवचनमें क्रमशः इस प्रकार रूप हैं—अक्ष्णा। अक्ष्णे। अक्ष्णः। अक्ष्णः। अक्षिण अक्षणि। शेष रूप हरि-शब्दके समान जानने चाहिये।