Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 204 of 770

Read in context
Page 204
२०२* संक्षिप्त नारदपुराण *

उत्पत्तिका वृत्तान्त संक्षेपसे कहूँगा। मुने! इस वृत्तान्तको सुनकर मनुष्य ब्रह्मतत्त्वका ज्ञाता हो सकता है। अधिक आयु हो जानेसे, बाल पक जानेसे, धनसे अथवा बन्धु-बान्धवोंसे कोई बड़ा नहीं होता। ऋषि-मुनियोंने यह धर्मपूर्ण निश्चय किया है कि हमलोगोंमें जो 'अनूचान' हो, वही महान् है।

नारदजीने पूछा—सबको मान देनेवाले विप्रवर! पुरुष 'अनूचान' कैसे होता है? वह उपाय मुझे बताइये; क्योंकि उसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।

सनन्दनजी बोले—नारद! सुनो, मैं अनूचानका लक्षण बताता हूँ, जिसे जानकर मनुष्य अङ्गोंसहित वेदोंका ज्ञाता होता है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्दःशास्त्र—इन छःको विद्वान् पुरुष वेदाङ्ग कहते हैं। धर्मका प्रतिपादन करनेमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चार वेद ही प्रमाण बताये गये हैं। जो श्रेष्ठ द्विज गुरुसे छहों अङ्गोंसहित वेदोंका अध्ययन भलीभाँति करता है, वह 'अनूचान' होता है; अन्यथा करोड़ों ग्रन्थ बाँच लेनेसे भी कोई 'अनूचान' नहीं कहला सकता।

नारदजीने कहा—मानद! आप अङ्गोंसहित इन सम्पूर्ण वेदोंके महापण्डित हैं। अतः मुझे अङ्गों और वेदोंका लक्षण विस्तारपूर्वक बताइये।

सनन्दनजी बोले—ब्रह्मन्! तुमने मुझपर प्रश्नका यह अनुपम भार रख दिया। मैं संक्षेपसे इन सबके सुनिश्चित सार-सिद्धान्तका वर्णन करूँगा। वेदवेत्ता ब्रह्मर्षियोंने वेदोंकी शिक्षामें स्वरको प्रधान कहा है; अतः स्वरका वर्णन करता हूँ, सुनो—स्वर-शास्त्रोंके निश्चयके अनुसार विशेषरूपसे आर्चिक (ऋक्सम्बन्धी), गाथिक (गाथा-सम्बन्धी) और सामिक (साम-सम्बन्धी) स्वर-व्यवधानका प्रयोग करना चाहिये। ऋचाओंमें एकका अन्तर देकर स्वर होता है। गाथाओंमें दोके व्यवधानसे और साम-मन्त्रोंमें तीनके व्यवधानसे स्वर होता है। स्वरोंका इतना ही व्यवधान सर्वत्र जानना चाहिये।

ऋक्, साम और यजुर्वेदके अङ्गभूत जो याज्य-स्तोत्र, करण और मन्त्र आदि याज्ञिकोंद्वारा यज्ञोंमें प्रयुक्त होते हैं, शिक्षा-शास्त्रका ज्ञान न होनेसे उनमें विस्वर (विरुद्ध स्वरका उच्चारण) हो जाता है। मन्त्र यदि यथार्थ स्वर और वर्णसे हीन हो तो मिथ्या-प्रयुक्त होनेके कारण वह उस अभीष्ट अर्थका बोध नहीं कराता; इतना ही नहीं, वह वाक्रूपी वज्र यजमानकी हिंसा कर देता है—जैसे 'इन्द्रशत्रु' यह पद स्वरभेदजनित अपराधके कारण यजमानके लिये ही अनिष्टकारी हो गया*। सम्पूर्ण वाङ्मयके उच्चारणके लिये वक्षःस्थल, कण्ठ और सिर—ये तीन स्थान हैं। इन तीनोंको सवन कहते हैं, अर्थात् वक्षःस्थानमें नीचे स्वरसे जो शब्दोच्चारण होता है, उसे प्रातःसवन कहते हैं; कण्ठस्थानमें मध्यम स्वरसे किये हुए शब्दोच्चारणका नाम माध्यन्दिनसवन है तथा मस्तकरूप स्थानमें उच्च स्वरसे जो शब्दोच्चारण होता है, उसे तृतीयसवन


*तैत्तिरीय शाखाकी कृष्णयजुःसंहिताके द्वितीय काण्डमें पञ्चम प्रपाठकके द्वितीय अनुवाककी प्रथम पञ्चशतीमें मन्त्र आया है—'स्वाहेन्द्रशत्रुर्वर्धस्व।' पौराणिक कथाके अनुसार त्वष्टा प्रजापतिने 'इन्द्रके शत्रु' वृत्रके अभ्युदयके लिये इस मन्त्रका उच्चारण किया था। 'इन्द्रस्य शत्रुः' इस विग्रहके अनुसार षष्ठी-समासमें समासान्तप्रयुक्त अन्तोदात्तका उच्चारण अभीष्ट था; परंतु प्रयोगमें पूर्वपदप्रकृतिस्वर-आद्युदात्त बोला गया; अतः वह बहुव्रीहिके अर्थका प्रकाशक हो गया। इसलिये 'इन्द्र है शत्रु (संहारक) जिसका वह' ऐसा अर्थ निकलनेके कारण वृत्रासुर ही इन्द्रके हाथसे मारा गया।