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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 199 of 770

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Page 199
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * १९७

जड़भरत और सौवीरनरेशका संवाद—परमार्थका निरूपण तथा ऋभुका निदाघको अद्वैतज्ञानका उपदेश

सनन्दनजी कहते हैं—नारदजी! ब्राह्मणका परमार्थयुक्त वचन सुनकर सौवीर-नरेशने विनयसे नम्र होकर कहा।

राजा बोले—विप्रवर! आपने सम्पूर्ण जीवोंमें व्यास जिस विवेक-विज्ञानका दर्शन कराया है, वह प्रकृतिसे परे ब्रह्मका ही स्वरूप है। परंतु आपने जो यह कहा कि मैं पालकी नहीं ढोता हूँ और न मुझपर पालकीका भार ही है। जिसने यह पालकी उठा रखी है, वह शरीर मुझसे भिन्न है। जीवोंकी प्रवृत्ति गुणोंकी प्रेरणासे होती है और ये गुण कर्मोंसे प्रेरित होकर प्रवृत्त होते हैं। इसमें मेरा कर्तृत्व क्या है? परमार्थके ज्ञाता द्विजश्रेष्ठ! आपकी वह बात कानमें पड़ते ही मेरा मन परमार्थका जिज्ञासु होकर उसे प्राप्त करनेके लिये विह्वल हो उठा है। महाभाग द्विज! मैं पहलेसे ही महर्षि कपिलके पास जाकर यह पूछनेके लिये उद्यत हुआ था कि इस जगत्में श्रेय क्या है, यह मुझे बताइये। किंतु इसके बीचमें ही आपने जो ये बातें कही हैं, उन्हें सुनकर मेरा मन परमार्थश्रवणके लिये आपकी ओर दौड़ रहा है। महर्षि कपिलजी सर्वभूतस्वरूप भगवान् विष्णुके अंश हैं और संसारके मोहका नाश करनेके लिये इस पृथ्वीपर उनका आगमन हुआ है—ऐसा मुझे जान पड़ता है। वे ही भगवान् कपिल मेरे हितकी कामनासे यहाँ आपके रूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए हैं, तभी तो आप ऐसा भाषण कर रहे हैं। अतः ब्रह्मन्! मेरे मोहका नाश करनेके लिये जो परम श्रेय हो, वह मुझे बताइये; क्योंकि आप सम्पूर्ण विज्ञानमय जलकी तरंगोंके समुद्र जान पड़ते हैं।

ब्राह्मणने कहा—भूपाल! क्या तुम श्रेयकी ही बात पूछते हो? या परमार्थ जाननेके लिये प्रश्न करते हो? राजन्! जो मनुष्य देवताकी आराधना करके धन-सम्पत्ति चाहता है, पुत्र तथा राज्य (एवं स्वर्ग)-की अभिलाषा करता है, उसके लिये तो वे ही वस्तुएँ श्रेय हैं; परंतु विवेकी पुरुषके लिये परमात्माकी प्राप्ति ही श्रेय है। स्वर्गलोकरूप फल देनेवाला जो यज्ञ आदि कर्म है, वह भी श्रेय ही है; परंतु प्रधान श्रेय तो उसके फलकी इच्छा न करनेमें ही है। भूपाल! योगयुक्त तथा अन्य पुरुषोंको भी सदा परमात्माका चिन्तन करना चाहिये; क्योंकि परमात्माका संयोगरूप जो श्रेय है, वही वास्तविक श्रेय है। इस प्रकार श्रेय तो अनेक हैं, सैकड़ों और हजारों प्रकारके हैं; किंतु वे सब परमार्थ नहीं हैं। परमार्थ मैं बतलाता हूँ, सुनो—यदि धन ही परमार्थ होता तो धर्मके लिये उसका त्याग क्यों किया जाता तथा भोगोंकी प्राप्तिके लिये उसका व्यय क्यों किया जाता? नरेश्वर! यदि इस संसारमें राज्य आदिकी प्राप्तिको परमार्थ कहा जाय तो वे कभी रहते हैं और कभी