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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 195 of 770

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Page 195
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    १९३

विष्णुका यजन किया। वे सदा भगवान्‌का ही चिन्तन करते और उन्हींमें मन लगाकर नाना सत्कर्मोंमें लगे रहते थे। तदनन्तर पुत्रोंको जन्म देकर विद्वान् राजा भरत विषयोंसे विरक्त हो गये और राज्य त्यागकर पुलस्त्य एवं पुलह मुनिके आश्रमको चले गये। उन महर्षियोंका आश्रम शालग्राम नामक महाक्षेत्रमें था। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले बहुत-से साधक उस तीर्थका सेवन करते थे। मुने! वहीं राजा भरत तपस्यामें संलग्न हो यथाशक्ति पूजनसामग्री जुटाकर उसके द्वारा भक्तिभावसे भगवान् महाविष्णुकी आराधना करने लगे। नारदजी! वे प्रतिदिन प्रातःकाल निर्मल जलमें स्नान करते तथा अविनाशी परब्रह्मकी स्तुति एवं प्रणवसहित वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए भक्तिपूर्वक सूर्यदेवका उपस्थान करते थे। तदनन्तर आश्रमपर लौटते और अपने ही लाये हुए समिधा, कुशा तथा मिट्टी आदि द्रव्योंसे और फल, फूल, तुलसीदल एवं स्वच्छ जलसे एकाग्रतापूर्वक जगदीश्वर भगवान् वासुदेवकी पूजा करते थे। भगवान्‌की पूजाके समय वे भक्तिके प्रवाहमें डूब जाते थे।

एक दिनकी बात है, महाभाग राजा भरत प्रातःकाल स्नान करके एकाग्रचित्त हो जप करते हुए तीन मुहूर्त (छः घड़ी)-तक शालग्रामीके जलमें खड़े रहे। ब्रह्मन्! इसी समय एक प्यासी हरिणी जल पीनेके लिये अकेली ही वनसे नदीके तटपर आयी। उसका प्रसवकाल निकट था। वह प्रायः जल पी चुकी थी, इतनेमें ही सब प्राणियोंको भय देनेवाली सिंहकी गर्जना उच्चस्वरसे सुनायी पड़ी। फिर तो वह उस सिंहनादसे भयभीत हो नदीके तटकी ओर उछल पड़ी। बहुत ऊँचाईकी ओर उछलनेसे उसका गर्भ नदीमें ही गिर पड़ा और तरङ्गमालाओंमें डूबता-उतराता हुआ वेगसे बहने लगा। राजा भरतने गर्भसे गिरे हुए उस मृगके बच्चेको दयावश उठा लिया। मुनीश्वर! उधर वह हरिणी गर्भ गिरनेके अत्यन्त दुःखसे और बहुत ऊँचे चढ़नेके परिश्रमसे थककर एक स्थानपर गिर पड़ी और वहीं मर गयी। उस हरिणीको मरी हुई देख तपस्वी राजा भरत मृगके बच्चेको लिये हुए अपने आश्रमपर आये और प्रतिदिन उसका पालन-पोषण करने लगे। मुने! उनसे पोषित होकर वह मृगका बच्चा बढ़ने लगा। उस मृगमें राजाका चित्त जैसा आसक्त हो गया था, वैसा भगवान्‌में भी नहीं हुआ। उन्होंने अपने राज्य और पुत्रोंको छोड़ा, समस्त भाई-बन्धुओंको भी त्याग दिया, परंतु इस हरिनके बच्चेमें ममता पैदा कर ली। उनका चित्त मृगकी ममताके वशीभूत हो गया था; इसलिये उनकी समाधि भङ्ग हो गयी। तदनन्तर कुछ समय बीतनेपर राजा भरत मृत्युको प्राप्त हुए। उस समय जैसे पुत्र पिताको देखता है, उसी प्रकार वह मृगका बच्चा आँसू बहाते हुए उनकी ओर देख रहा था। राजा भी प्राणोंका त्याग करते समय उस मृगकी ही