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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 186
१८४* संक्षिप्त नारदपुराण *

करते हैं और वे भूतप्राणी भी उनके भीतर रहते हैं तथा वे परमात्मा ही जगत्‌के धारण-पोषण करनेवाले और स्रष्टा हैं; अतः उन सर्वशक्तिमान् प्रभुको ‘वासुदेव’ कहा गया है*। मुने! जो सम्पूर्ण जगत्‌के आत्मा तथा समस्त आवरणोंसे परे हैं, वे परमात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी प्रकृति, प्राकृत विकार तथा गुण और दोषोंसे ऊपर उठे हुए हैं। पृथ्वी और आकाशके बीचमें जो कुछ स्थित है, वह सब उन्हींसे व्यास है। सम्पूर्ण कल्याणमय गुण उनके स्वरूप हैं। उन्होंने अपनी शक्तिके लेशमात्रसे सम्पूर्ण भूतसमुदायको व्याप्त कर रखा है। वे अपनी इच्छामात्रसे मनके अनुकूल अनेक शरीर धारण करते हैं और सारे जगत्‌का हित-साधन करते रहते हैं। वे तेज, बल, ऐश्वर्य, महान् ज्ञान, उत्तम वीर्य और शक्ति आदि गुणोंकी एकमात्र राशि हैं। प्रकृति आदिसे भी परे हैं और उन समस्त कार्य-कारणोंके स्वामी परमेश्वरमें समस्त क्लेशोंका सर्वथा अभाव है। वे सबका शासन करनेवाले ईश्वर हैं। व्यष्टि और समष्टि जगत् उन्हींका स्वरूप है। वे ही व्यक्त हैं और वे ही अव्यक्त। वे सबके स्वामी, सम्पूर्ण सृष्टिके ज्ञाता, सर्वशक्तिमान् तथा परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध हैं। जिसके द्वारा निर्दोष, विशुद्ध निर्मल तथा एकरूप परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार अथवा बोध होता है, उसीका नाम ज्ञान है और इसके विपरीत जो कुछ है, वह अज्ञान कहा गया है। भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन स्वाध्याय और संयमसे होता है। ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण होनेसे वेदका भी नाम ब्रह्म ही है। इसीलिये वेदोंका स्वाध्याय किया जाता है। स्वाध्यायसे योगका अनुष्ठान करे और योगसे स्वाध्यायका अभ्यास करे। इस प्रकार स्वाध्याय और योग—दोनों साधनोंका सम्पादन होनेसे परमात्मा प्रकाशित होते हैं। उनका दर्शन करनेके लिये स्वाध्याय और योग दोनों नेत्र हैं।

**नारदजीने पूछा—**भगवान्! जिसके जान लेनेपर मैं सर्वाधार परमेश्वरका दर्शन कर सकूँ, उस योगको मैं जानना चाहता हूँ। कृपा करके उसका वर्णन कीजिये।

**सनन्दनजीने कहा—**पूर्वकालमें केशिध्वजने महात्मा खाण्डिक्य जनकको जिस प्रकार योगका उपदेश दिया था, वही मैं तुम्हें बतलाता हूँ।

**नारदजीने पूछा—**ब्रह्मन्! खाण्डिक्य और केशिध्वज कौन थे? तथा उनमें योगसम्बन्धी बातचीत किस प्रकार हुई थी?

**सनन्दनजीने कहा—**नारदजी! पूर्वकालमें धर्मध्वज जनक नामक एक राजा हो गये हैं। उनके बड़े पुत्रका नाम अमितध्वज था। उसके छोटे भाई कृतध्वजके नामसे विख्यात थे। राजा कृतध्वज सदा अध्यात्मचिन्तनमें ही अनुरक्त रहते थे। कृतध्वजके पुत्र केशिध्वज हुए। ब्रह्मन्! वे अपने सद्ज्ञानके कारण धन्य हो गये थे। अमितध्वजके पुत्रका नाम खाण्डिक्य जनक था। खाण्डिक्य कर्मकाण्डमें निपुण थे। एक समय केशिध्वजने खाण्डिक्यको परास्त करके उन्हें राज्यसिंहासनसे उतार दिया। राज्यसे भ्रष्ट होनेपर खाण्डिक्य थोड़ी-सी साधन-सामग्री लेकर पुरोहित और मन्त्रियोंके साथ एक दुर्गम वनमें चले गये। इधर केशिध्वजने ज्ञाननिष्ठ होते हुए भी निष्कामभावसे अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान


* भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसन्त्यत्र च तानि यत्। धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः॥ (ना० पूर्व० ४६। २५)