संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 183 of 770
Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | १८१
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लिये है। गुदा नामक इन्द्रियका कार्य मलत्याग करना है। वाक्-इन्द्रिय शब्दविशेषका उच्चारण करनेके लिये है। मनको इन पाँचोंसे संयुक्त माना गया है। इस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और मन—ये सब मिलकर ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। इन सबको मनरूप जानकर बुद्धिके द्वारा शीघ्र इनका त्याग कर देना चाहिये। श्रवणकालमें श्रोत्ररूपी इन्द्रिय, शब्दरूपी विषय और चित्तरूपी कर्ता—इन तीनका संयोग होता है। इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धके अनुभवकालमें भी इन्द्रिय, विषय एवं मनका संयोग अपेक्षित है। इस तरह तीन-तीनके पाँच समुदाय हैं। ये सब गुण कहे गये हैं। इनसे शब्दादि विषयोंका ग्रहण होता है और इसीके लिये ये कर्ता, कर्म और करणरूपी त्रिविध भाव बारी-बारीसे उपस्थित होते हैं। इनमेंसे एक-एकसे सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं। हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्तकी शान्ति—ये सब भाव बिना किसी कारणके हों या किसी कारणवश हों¹, सात्त्विक गुण माने गये हैं। असंतोष, संताप, शोक, लोभ तथा क्षमाका अभाव—ये किसी कारणसे हों या अकारण—रजोगुणके चिह्न हैं। अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्र और आलस्य—ये किसी तरह भी क्यों न हों, तमोगुणके ही नाना रूप हैं²।
जो इस मोक्ष-विद्याको जानकर सावधानीके साथ आत्मतत्त्वका अनुसंधान करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी भाँति कर्मके अनिष्ट फलोंसे कभी लिप्त नहीं होता। संतानोंके प्रति आसक्ति और भिन्न-भिन्न देवताओंके लिये सकाम यज्ञोंका अनुष्ठान—ये सब मनुष्यके लिये नाना प्रकारके दृढ़ बन्धन हैं। जब वह इन बन्धनोंसे छूटकर दुःख-सुखकी चिन्ता छोड़ देता है, उस समय सर्वश्रेष्ठ गति (मुक्ति) प्राप्त कर लेता है। श्रुतिके महावाक्योंका विचार और शास्त्रमें बताये हुए मङ्गलमय साधनोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य जरा तथा मृत्युके भयसे रहित होकर सुखसे रहता है। जब पुण्य और पापका क्षय तथा उनसे मिलनेवाले सुख-दुःखादि फलोंका नाश हो जाता है, उस समय सब वस्तुओंकी आसक्तिसे रहित
१. मनमें हर्ष, प्रीति आदि भावोंका उदय जब किसी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति आदिसे होता है तो उसे कारणवश हुआ कहा गया है और जब वैराग्य आदिसे स्वतः उक्त भावोंका उदय हो तो उसे अकारण माना गया है।
२.महाभारत शान्तिपर्व अध्याय २१८ और २१९ में भी यही प्रसङ्ग आया है। २१९ के २८ वें श्लोकतक यह प्रसङ्ग ज्यों-का-त्यों है। इसके आगे महाभारतमें पंद्रह श्लोक अधिक हैं, जो इस प्रसङ्गकी दृष्टिसे अत्यन्त आवश्यक हैं। नारदपुराणके श्लोक सतहत्तरके बाद ही उन श्लोकोंका भाव अपेक्षित है। अतः प्रसङ्गकी पूर्तिके लिये यहाँ उन श्लोकोंमेंसे कुछका संक्षिप्त भाव दिया जाता है।
'शब्दका आधार श्रोत्रेन्द्रिय है और श्रोत्रेन्द्रियका आधार आकाश है, अतः वह आकाशरूप ही है। इसी प्रकार त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, रूप, रस और गन्धका आश्रय तथा अपने आधारभूत महाभूतोंके स्वरूप हैं। इन सबका अधिष्ठान है मन; इसलिये सब-के-सब मनःस्वरूप हैं। क्योंकि जब सब इन्द्रियोंका कार्य एक समय प्रारम्भ होता है, तब उन सबके विषयोंको एक साथ अनुभव करनेके लिये मन ही सबमें अनुगतरूपसे उपस्थित रहता है; अतः मनको ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है और बुद्धि बारहवीं मानी गयी है। इस प्रकार समस्त प्राणी अनादि अविद्याके कारण स्वभावतः व्यवहारपरायण हो रहे हैं। ऐसी दशामें ज्ञानद्वारा अविद्याकी निवृत्ति हो जाती है। तब केवल सनातन आत्मा ही रह जाता है। जैसे नद और नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपने नाम-रूपको त्याग देती हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणी अपने नाम और रूपको त्यागकर महत्स्वरूपमें प्रतिष्ठित होते हैं। यही उनका मोक्ष है।