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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 177 of 770

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Page 177
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * १७५

ये तीन गुण सदा प्राणियोंके भीतर रहते हैं। इसलिये सब जीवोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यह तीन प्रकारकी अनुभूति देखी जाती है। तुम्हारे शरीर अथवा मनमें जो कुछ प्रसन्नतासे संयुक्त है, वह सब सात्त्विक भाव है। मुनिश्रेष्ठ ! जो कुछ भी दुःखसे संयुक्त और मनको अप्रसन्न करनेवाला है, उसे रजोगुणका ही प्रकाश समझो। इससे अतिरिक्त जो कुछ मोहसे संयुक्त हो और उसका आधार व्यक्त न हो तथा जो ज्ञानमें न आता हो, वह तमोगुण है—ऐसा निश्चय करे। हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख एवं चित्तकी शान्ति—इन भावोंको सात्त्विक गुण समझना चाहिये। असंतोष, परिताप, शोक, लोभ तथा असहनशीलता—ये रजोगुणके चिह्न हैं। अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्न, तन्द्रा आदि भाव तमोगुणके ही भिन्न-भिन्न कार्य हैं। जो बहुधा दोषकी ओर जाता है, उस मनके दो स्वरूप हैं—याचना करना और संशय। जिसका मन अपने अधीन है, वह इस लोकमें तो सुखी होता ही है, मरनेके बाद परलोकमें भी उसे सुख मिलता है।

सत्त्व (बुद्धि) तथा क्षेत्रज्ञ (पुरुष)—ये दोनों सूक्ष्म हैं। जिसे इन दोनोंका अन्तर (पार्थक्य) ज्ञात हो जाता है, वह भी इहलोक और परलोकमें सुखका भागी होता है। इनमें एक तो गुणोंकी सृष्टि करता है और एक नहीं करता। सत्त्व आदि गुण आत्माको नहीं जानते, किंतु आत्मा सब प्रकारसे गुणोंको जानता है। यद्यपि पुरुष गुणोंका द्रष्टामात्र है, तथापि बुद्धिके संसर्गसे वह अपनेको उनका स्रष्टा मानता है। इस प्रकार सत्त्व और पुरुषका संयोग हुआ है, किंतु इनका पार्थक्य निश्चित है। जब बुद्धि मनके द्वारा इन्द्रियरूपी घोड़ोंकी रास खींचती है और भलीभाँति काबूमें रखती है, उस समय आत्मा प्रकाशित होने लगता है। जो मुनि प्राकृत कर्मोंका त्याग करके सदा आत्मामें ही रमण करता है, वह सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा होकर उत्तम गतिको प्राप्त होता रहता है। जैसे जलचर पक्षी जलसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शुद्धबुद्धिपुरुष लिप्त नहीं होता। वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें अनासक्तभावसे रहता है। इस प्रकार अपनी बुद्धिद्वारा विचार करके मनुष्य अनासक्त-भावसे व्यवहार करे। वह हर्ष-शोकसे रहित हो सभी अवस्थाओंमें सम रहे। ईर्ष्या-द्वेषको त्याग दे। बुद्धि और चेतनकी एकता है, यही हृदयकी सुदृढ़ ग्रन्थि है। इसको खोलकर विद्वान् पुरुष सुखी हो जाय और संशयका उच्छेद करके सदाके लिये शोक त्याग दे। जैसे मलिन मनुष्य गङ्गामें स्नान करके शुद्ध होते हैं, उसी प्रकार श्रेष्ठ विद्वान् इस ज्ञानगङ्गामें गोता लगाकर निर्मल हो जाते हैं—ऐसा जानो। इस तरह जो मनुष्य इस उत्तम अध्यात्म-ज्ञानको जानते हैं, वे कैवल्यको प्राप्त होते हैं। ऐसा समझकर सब मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंके आवागमनपर दृष्टि रखते हुए बुद्धिपूर्वक विचार करें। इससे धीरे-धीरे शान्ति प्राप्त होती है। जिनका