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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 164 of 770

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Page 164

१६२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

थे और पाँचवें देवराजका नाम विभु कहा गया है। छठे (चाक्षुष) मन्वन्तरमें आर्य आदि देवता बताये गये हैं। उन सबके इन्द्रका नाम मनोजव था। इस सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें आदित्य, वसु तथा रुद्र आदि देवता हैं और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न आप ही इन्द्र हैं। आपका विशेष नाम पुरन्दर बताया गया है। आठवें सूर्यसावर्णि मन्वन्तरमें अप्रमेय तथा सुतप आदि होनेवाले देवता बताये जाते हैं। भगवान् विष्णुकी आराधनाके प्रभावसे राजा बलि उनके इन्द्र होंगे। नवें दक्षसावर्णि मन्वन्तरमें पार आदि देवता होंगे और उनके इन्द्रका नाम अद्भुत बताया जाता है। दसवें ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तरमें सुवासन आदि देवता कहे गये हैं। उनके इन्द्रका नाम शान्ति होगा। ग्यारहवें धर्मसावर्णि मन्वन्तरमें विहङ्गम आदि देवता होंगे और उनके इन्द्र वृष नामसे प्रसिद्ध होंगे। बारहवें रुद्रसावर्णि मन्वन्तरमें हरित आदि देवता तथा ऋतुधामा नामवाले इन्द्र होंगे। तेरहवें रोचमान या रौच्य नामक मन्वन्तरमें सुत्रामा आदि देवता होंगे। उनके महापराक्रमी इन्द्रका नाम दिवस्पति कहा जाता है। चौदहवें भौत्य मन्वन्तरमें चाक्षुष आदि देवता होंगे और उनके इन्द्रकी शुचि नामसे प्रसिद्धि होगी। देवराज! इस प्रकार मैंने भूत और भविष्य मनु, इन्द्र तथा देवताओंका यथार्थ वर्णन किया है। ये सब ब्रह्माजीके एक दिनमें अपने अधिकारका उपभोग करते हैं। सम्पूर्ण लोकों तथा सभी स्वर्गोंमें एक ही तरहकी सृष्टि कही गयी है। उस सृष्टिके विधाता बहुत हैं। उनकी संख्या यहाँ कौन जानता है? देवराज! मेरे ब्रह्मलोकमें रहते समय बहुत-से ब्रह्मा आये और चले गये। आज मैं उनकी संख्या बतानेमें असमर्थ हूँ। इस स्वर्गलोकमें आकर भी मेरा जितना समय बीता है, उसको सुनो— 'अबतक चार मनु बीत गये, किंतु मेरी समृद्धिका विस्तार बढ़ता ही गया। प्रभो! अभी मुझे सौ करोड़ युगोंतक यहीं रहना है। तत्पश्चात् मैं कर्मभूमिको जाऊँगा।'

महात्मा सुधर्मके ऐसा कहनेपर देवराज मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और निरन्तर भगवान् विष्णुकी आराधनामें लग गये। यद्यपि देवतालोग स्वर्गका सुख भोगते हैं तथापि वे सब इस भारतवर्षमें जन्म पानेके लिये लालायित रहते हैं। जो भगवान् नारायणकी पूजा करते हैं, उन महात्माओंकी पूजा सदा ब्रह्मा आदि देवता किया करते हैं। जो महात्मा सब प्रकारके संग्रह-परिग्रहका त्याग करके निरन्तर भगवान् नारायणके चिन्तनमें लगे रहते हैं, उन्हें भयङ्कर संसारका बन्धन कैसे प्राप्त हो सकता है? यदि कोई उन महापुरुषोंके सङ्गका लोभ रखते हैं तो वे भी मोक्षके भागी हो जाते हैं। जो मानव प्रतिदिन सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके गरुड़वाहन भगवान् नारायणकी अर्चना करते हैं, वे सम्पूर्ण पापराशियोंसे सर्वथा मुक्त होकर हर्षपूर्ण हृदयसे भगवान् विष्णुके कल्याणमय पदको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य आसक्तिरहित तथा पर-अवर (उत्तम-मध्यम, शुभ-अशुभ)-के ज्ञाता हैं और निरन्तर देवगुरु भगवान् नारायणका चिन्तन करते रहते हैं, उस ध्यानसे उनके अन्तःकरणकी सारी पापराशि नष्ट हो जाती है और वे फिर कभी माताके स्तनोंका दूध नहीं पीते। जो मानव भगवान्की कथा श्रवण करके अपने समस्त दोष-दुर्गुण दूर कर चुके हैं और जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी


मार्कण्डेयपुराणमें तामस मन्वन्तरके देवता सत्य, सुधी, हरि तथा सुरूप बताये गये हैं और इन्द्रका नाम 'शिखी' कहा गया है।