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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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Page 151
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * १४९

धनोपार्जन करनेमें संलग्न हो गये। जो वस्तु नहीं बेचनी चाहिये, उसको भी वे बेचने लगे। उन्होंने रसका भी विक्रय किया। वे चाण्डाल आदिसे भी बात करते और उनका दिया हुआ दान ग्रहण करते थे। उन्होंने पैसे लेकर तपस्या और व्रतोंका विक्रय किया और तीर्थयात्रा भी वे दूसरोंके लिये ही करते थे। यह सब उन्होंने अपनी स्त्रीको संतुष्ट करनेके लिये ही किया। विप्रवर ! इसी तरह कुछ समय बीत जानेपर ब्राह्मणके दो जुड़वे पुत्र हुए, जिनका नाम था—यज्ञमाली और सुमाली। वे दोनों बड़े सुन्दर थे। तदनन्तर पिता उन दोनों बालकोंका बड़े स्नेह और वात्सल्यसे अनेक प्रकारके साधनोंद्वारा पालन-पोषण करने लगे। वेदमालिने अनेक उपायोंसे यत्नपूर्वक धन एकत्र किया और एक दिन मेरे पास कितना धन है यह जाननेके लिये उन्होंने अपने धनको गिनना प्रारम्भ किया। उनका धन संख्यामें बहुत ही अधिक था। इस प्रकार धनकी स्वयं गणना करके वे हर्षसे फूल उठे। साथ ही उस अर्थकी चिन्तासे उन्हें बड़ा विस्मय भी हुआ। वे सोचने लगे—मैंने नीच पुरुषोंसे दान लेकर, न बेचने योग्य वस्तुओंका विक्रय करके तथा तपस्या आदिको भी बेचकर यह प्रचुर धन पैदा किया है। किंतु मेरी अत्यन्त दुःसह तृष्णा अब भी शान्त नहीं हुई। अहो! मैं तो समझता हूँ, यह तृष्णा बहुत बड़ा कष्ट है, समस्त क्लेशोंका कारण भी यही है। इसके कारण मनुष्य यदि समस्त कामनाओंको प्राप्त कर ले तो भी पुनः दूसरी वस्तुओंकी अभिलाषा करने लगता है। जरावस्था (बुढ़ापे)-में आनेपर मनुष्यके केश पक जाते हैं, दाँत गल जाते हैं, आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं; किंतु एक तृष्णा ही तरुण-सी होती जाती है¹। मेरी सारी इन्द्रियाँ शिथिल हो रही हैं, बुढ़ापने मेरे बलको भी नष्ट कर दिया, किंतु तृष्णा तरुणी हो और भी प्रबल हो उठी है। जिसके मनमें कष्टदायिनी तृष्णा मौजूद है, वह विद्वान् होनेपर भी मूर्ख हो जाता है। परम शान्त होनेपर भी अत्यन्त क्रोधी हो जाता है और बुद्धिमान् होनेपर भी अत्यन्त मूढ़बुद्धि हो जाता है। आशा मनुष्योंके लिये अजेय शत्रुके भाँति भयंकर है। अतः विद्वान् पुरुष यदि शाश्वत सुख चाहे तो आशाको त्याग दे। बल हो, तेज हो, विद्या हो, यश हो, सम्मान हो, नित्य वृद्धि हो रही हो और उत्तम कुलमें जन्म हुआ हो तो भी यदि मनमें आशा, तृष्णा बनी हुई है तो वह बड़े वेगसे इन सबपर पानी फेर देती है²। मैंने बड़े क्लेशसे यह धन कमाया है। अब मेरा शरीर भी गल गया। बुढ़ापने मेरे बलको नष्ट कर दिया। अतः अब मैं उत्साहपूर्वक परलोक सुधारनेका यत्न करूँगा। विप्रवर! ऐसा निश्चय करके वेदमालि धर्मके मार्गपर चलने लगे। उन्होंने उसी क्षण उस सारे धनको चार भागोंमें बाँटा। अपने द्वारा पैदा किये उस धनमेंसे दो भाग तो ब्राह्मणने स्वयं रख लिये और शेष दो भाग दोनों पुत्रोंको दे दिये। तदनन्तर अपने किये हुए पापोंका नाश करनेकी इच्छासे उन्होंने जगह-जगह पौंसले, पोखरे, बगीचे और बहुत-से देवमन्दिर बनाये तथा गङ्गाजीके तटपर अन्न आदिका दान भी किया।


१. जीर्यन्ति जीर्यतः केशाः दन्ताः जीर्यन्ति जीर्यतः। चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका तरुणायते॥
(ना० पूर्व० ३५। २१)
२. आशा भयंकररी पुंसामजेयारातिसन्निभा। तस्मादाशां त्यजेत्प्राज्ञो यदिच्छेच्छाश्वतं सुखम्॥
बलं तेजो यशश्चैव विद्यां मानं च वृद्धताम्। तथैव सत्कुले जन्म आशा हन्त्यतिवेगतः॥
(ना० पूर्व० ३५। २४-२५)