संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१४४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
ध्यानसे मोक्ष मिलता है। ध्यानसे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं तथा ध्यानसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि हो जाती है*। भगवान् महाविष्णुके जो-जो स्वरूप हैं, उनमेंसे किसीका भी एकाग्रतापूर्वक ध्यान करे। उस ध्यानसे संतुष्ट होकर भगवान् विष्णु निश्चय ही मोक्ष देते हैं। साधुशिरोमणे! ध्येय वस्तुमें मनको इस प्रकार स्थिर कर देना चाहिये कि ध्याता, ध्यान और ध्येयकी त्रिपुटीका तनिक भी भान न रह जाय। तब ज्ञानरूपी अमृतके सेवनसे अमृतत्व (परमात्मा)-को प्राप्त होता है।
निरन्तर ध्यान करनेसे ध्येय वस्तुके साथ अपना अभेदभाव स्पष्ट अनुभव हो जाता है। जिसकी सब इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो जाती हैं और वह परमानन्दसे पूर्ण हो वायुशून्य स्थानमें जलते हुए दीपककी भाँति अविचलभावसे ध्यानमें स्थित हो जाता है, तो उसकी इस ध्येयाकार स्थितिको 'समाधि' कहते हैं। नारदजी! योगी पुरुष समाधि-अवस्थामें न देखता है, न सुनता है, न सूँघता है, न स्पर्श करता है और न वह कुछ बोलता ही है। उस अवस्थामें योगियोंको सम्पूर्ण उपाधियोंसे मुक्त, शुद्ध, निर्मल, सच्चिदानन्दस्वरूप तथा अविचल आत्माका साक्षात्कार होता है। विद्वान् नारदजी! यह आत्मा परम ज्योतिर्मय तथा अमेय है। जो मायाके अधीन हैं, उन्हींको वह मायायुक्त-सा प्रतीत होता है। उस मायाका निवारण होनेपर वह निर्मल ब्रह्मरूपसे प्रकाशित होता है। वह ब्रह्म एक, अद्वितीय, परमज्योतिःस्वरूप, निरञ्जन तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मारूपसे स्थित है। परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान्से भी अत्यन्त महान् है। वह सनातन परमेश्वर समस्त विश्वका कारण है। ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुरुष परम पवित्र परात्पर ब्रह्मरूपमें उसका दर्शन करते हैं। अकारसे लेकर हकारतकके भिन्न-भिन्न वर्णोंके रूपमें स्थित अनादि पुराणपुरुष परमात्माको ही शब्दब्रह्म कहा गया है और जो विशुद्ध, अक्षर, नित्य, पूर्ण, हृदयाकाशके मध्य विराजमान अथवा आकाशमें व्यास, आनन्दमय, निर्मल एवं शान्त तत्त्व है, उसीको 'परब्रह्म परमात्मा' कहते हैं, योगीलोग अपने हृदयमें जिन अजन्मा, शुद्ध, विकाररहित, सनातन परमात्माका दर्शन करते हैं, उन्हींका नाम परब्रह्म है।
मुनिश्रेष्ठ! अब दूसरा ध्यान बतलाता हूँ, सुनो। परमात्माका यह ध्यान संसार-तापसे संतप्त मनुष्योंको अमृतकी वर्षाके समान शान्ति प्रदान करनेवाला है। परमानन्दस्वरूप भगवान् नारायण प्रणवमें स्थित हैं—ऐसा चिन्तन करे। उनकी कहीं उपमा नहीं है। वे प्रणवकी अर्धमात्राके ऊपर विराजमान नादस्वरूप हैं। अकार ब्रह्माजीका रूप है, उकार भगवान् विष्णुका स्वरूप है,
*ध्यानात्पापानि नश्यन्ति ध्यानान्मोक्षं च विन्दति। ध्यानात्प्रसीदति हरिर्ध्यानात्सर्वार्थसाधनम्॥
(ना० पूर्व० ३३। १३९)