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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 137 of 770

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Page 137
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * | १३५
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महीनेकी पूर्णता होनेपर उसके हाथ-पैर आदि अवयव प्रकट होते हैं और चार महीने बीत जानेपर उसके सब अवयवोंकी सन्धिका भेद ज्ञात होने लगता है। पाँच महीनेपर अँगुलियोंमें नख प्रकट होते हैं। छः मास पूरे हो जानेपर नखोंकी सन्धि स्पष्ट हो जाती है। उसकी नाभिमें जो नाल होती है, उसीके द्वारा अन्नका रस पाकर वह पुष्ट होता है। उसके सारे अङ्ग अपवित्र मल-मूत्र आदिसे भीगे रहते हैं। जरायुमें उसका शरीर बँधा होता है और वह माताके रक्त, हड्डी, कीड़े, वसा, मज्जा, स्नायु और केश आदिसे दूषित तथा घृणित शरीरमें निवास करता है। माताके खाये हुए कड़वे, खट्टे, नमकीन तथा अधिक गरम भोजनसे वह अत्यन्त दग्ध होता रहता है। इस दुरवस्थामें अपने-आपको देखकर वह देहधारी जीव पूर्वजन्मोंकी स्मृतिके प्रभावसे पहलेके अनुभव किये हुए नरकके दुःखोंको भी स्मरण करता और आन्तरिक दुःखसे अधिकाधिक जलने लगता है। ‘अहो! मैं बड़ा पापी हूँ! कामसे अन्धा होनेके कारण परायी स्त्रियोंको हरकर उनके साथ सम्भोग करके मैंने बड़े-बड़े पाप किये हैं। उन पापोंसे अकेला मैं ही ऐसे-ऐसे नरकोंका कष्ट भोगता रहा। फिर स्थावर आदि योनियोंमें महान् दुःख भोगकर अब मानवयोनिमें आया हूँ। आन्तरिक दुःख तथा बाह्य संतापसे दग्ध हो रहा हूँ। अहो! देहधारियोंको कितना दुःख उठाना पड़ता है। शरीर पापसे ही उत्पन्न होता है। इसलिये पाप नहीं करना चाहिये। मैंने कुटुम्ब, मित्र और स्त्रीके लिये दूसरोंका धन चुराया है। उसी पापसे आज गर्भकी झिल्लीमें बँधा हुआ जल रहा हूँ। पूर्वजन्ममें दूसरोंका धन देखकर ईर्ष्यावश जला करता था; इसीलिये मैं पापी जीव इस समय भी गर्भकी आगसे निरन्तर दग्ध हो रहा हूँ। मन, वाणी और शरीरसे मैंने दूसरोंको बहुत पीड़ा दी थी। उस पापसे आज मैं अकेला ही अत्यन्त दुःखी होकर जल रहा हूँ।’ इस प्रकार वह गर्भस्थ जीव नाना प्रकारसे विलाप करके स्वयं ही अपने-आपको इस प्रकार आश्वासन देता है—‘अब मैं जन्म लेनेके बाद सत्सङ्ग तथा भगवान् विष्णुकी कथाका श्रवण करके विशुद्ध-चित्त हो सत्कर्मोंका अनुष्ठान करूँगा और सम्पूर्ण जगत्के अन्तरात्मा तथा अपनी शक्तिके प्रभावसे अखिल विश्वकी सृष्टि करनेवाले सत्य-ज्ञानानन्दस्वरूप लक्ष्मीपति भगवान् नारायणके उन युगल-चरणारविन्दोंका भक्तिपूर्वक पूजन करूँगा। जिनकी समस्त देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग, मुनि तथा किन्नरसमुदाय आराधना करते रहते हैं। भगवान्के वे चरण दुस्सह संसार-बन्धनके मूलोच्छेदके हेतु हैं। वेदोंके रहस्यभूत उपनिषदोंद्वारा उनकी महिमाका स्पष्ट ज्ञान होता है। वे ही सम्पूर्ण जगत्के आश्रय हैं। मैं उन्हीं भगवच्चरणारविन्दोंको अपने हृदयमें रखकर अत्यन्त दुःखसे भरे हुए संसारको लाँघ जाऊँगा।’ इस प्रकार वह मनमें भावना करता है।

नारदजी! जब माताके प्रसवका समय आता है, उस समय वह गर्भस्थ जीव वायुसे अत्यन्त पीड़ित हो माताको भी दुःख देता हुआ कर्मपाशसे बँधकर जबरदस्ती योनिमार्गसे निकलता है। निकलते समय सम्पूर्ण नरक-यातनाओंका भोग उसे एक ही साथ भोगना पड़ता है। बाहरकी वायुका स्पर्श होते ही उसकी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है। फिर वह जीव बाल्यावस्थाको प्राप्त होता है। उसमें भी अपने ही मल-मूत्रमें उसका शरीर लिपटा रहता है। आध्यात्मिक आदि त्रिविध दुःखोंसे पीड़ित होकर भी वह कुछ नहीं बता सकता। उसके रोनेपर लोग यह समझते हैं कि यह भूख-प्याससे कष्ट पा रहा है, इसे दूध आदि देना चाहिये और इसी मान्यताके अनुसार