संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 133 of 770
Read in context- पूर्वभाग-प्रथम पाद *
१३१
हुए बड़े कष्टसे उस पथपर चल पाते हैं। वहाँ कहीं कीचड़ है, कहीं जलती हुई आग है, कहीं तपायी हुई बालू बिछी है, कहीं तीखी धारवाली शिलाएँ हैं। कहीं काँटेदार वृक्ष हैं और कहीं ऐसे-ऐसे पहाड़ हैं, जिनकी शिलाओंपर चढ़ना अत्यन्त दुःखदायक होता है। कहीं काँटोंकी बहुत बड़ी बाड़ लगी हुई है, कहीं-कहीं कन्दरामें प्रवेश करना पड़ता है। उस मार्गमें कहीं कंकड़ हैं, कहीं ढेले हैं और कहीं सुईके समान काँटे बिछे हैं तथा कहीं बाघ गरजते रहते हैं। नारदजी ! इस प्रकार पापी मनुष्य—भाँति-भाँतिके क्लेश उठाते हुए यात्रा करते हैं। कोई पाशमें बँधे होते हैं, कोई अंकुशोंसे खींचे जाते हैं और किन्हींकी पीठपर अस्त्र-शस्त्रोंकी मार पड़ती रहती है। इस दुर्दशाके साथ पापी उस मार्गपर जाते हैं। किन्हींकी नाक छेदकर उसमें नकेल डाल दी जाती है और उसीको पकड़कर खींचा जाता है। कोई आँतोंसे बँधे रहते हैं और कुछ पापी अपने शिश्नके अग्रभागसे लोहेका भारी भार ढोते हुए यात्रा करते हैं। कोई नासिकाके अग्रभागद्वारा लोहेका दो भार ढोते हैं और कोई पापी दोनों कानोंसे दो लौहभार वहन करते हुए उस मार्गपर चलते हैं। कोई अत्यन्त उच्छ्वास लेते हैं और किन्हींकी आँखें ढक दी जाती हैं। उस मार्गमें कहीं विश्रामके लिये छाया और पीनेके लिये जलतक नहीं है। अतः पापी लोग जानकर या अनजानमें किये हुए अपने पापकर्मोंके लिये शोक करते हुए अत्यन्त दुःखसे यात्रा करते हैं।
नारदजी ! जो उत्तम बुद्धिवाले मानव धर्मनिष्ठ और दानशील होते हैं, वे अत्यन्त सुखी होकर धर्मराजके लोककी यात्रा करते हैं। मुनिश्रेष्ठ ! अन्न देनेवाले स्वादिष्ट अन्नका भोजन करते हुए जाते हैं। जिन्होंने जल दान किया है, वे भी अत्यन्त सुखी होकर उत्तम दूध पीते हुए यात्रा करते हैं। मट्ठा और दही दान करनेवाले तत्सम्बन्धी भोग मट्ठा और दही दान करनेवाले तत्सम्बन्धी भोग प्राप्त करते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! घृत, मधु और दूधका दान करनेवाले पुरुष सुधापान करते हुए धर्ममन्दिरको जाते हैं। साग देनेवाला खीर खाता है और दीप देनेवाला सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जाता है। मुनिप्रवर ! वस्त्र-दान करनेवाला पुरुष दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित होकर यात्रा करता है। जिसने आभूषण दान किया है, वह उस मार्गपर देवताओंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ जाता है। गोदानके पुण्यसे मनुष्य सब प्रकारके सुख-भोगसे सम्पन्न होकर जाता है। द्विजश्रेष्ठ ! घोड़े, हाथी तथा रथकी सवारीका दान करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण भोगोंसे युक्त विमानद्वारा धर्मराजके मन्दिरको जाता है। जिस श्रेष्ठ पुरुषने माता-पिताकी सेवा-शुश्रूषा की है, वह देवताओंसे पूजित हो प्रसन्नचित्त होकर धर्मराजके घर जाता है। जो यतियों, व्रतधारियों तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, वह बड़े सुखसे धर्मलोकको जाता है। जो सम्पूर्ण भूतोंके प्रति दयाभाव रखता है, वह द्विज