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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 125 of 770

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Page 125
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद *
    १२३

द्वादशीके व्रतमें सूर्योदयव्यापिनी द्वादशी ग्रहण करनी चाहिये। सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणमें जबतक ग्रहण लगा रहे, तबतककी तिथि जप आदिमें ग्रहण करने योग्य है।

अब सम्पूर्ण संक्रान्तियोंमें होनेवाले पुण्यकालका वर्णन किया जाता है। सूर्यकी संक्रान्तियोंमें स्नान, दान और जप आदि करनेवालोंको अक्षय फल प्राप्त होता है। इन संक्रान्तियोंमें कर्ककी संक्रान्तिको दक्षिणायन संक्रम जानना चाहिये। कर्ककी संक्रान्तिमें विद्वान् लोग पहलेकी तीस घड़ीको पुण्यकाल मानते हैं। वृष, वृश्चिक, सिंह और कुम्भ राशिकी संक्रान्तियोंमें पहलेके आठ मुहूर्त (सोलह घड़ी) स्नान और जप आदिमें ग्राह्य हैं। और तुला तथा मेषकी संक्रान्तियोंमें पूर्व और परकी दस-दस घड़ियाँ स्नान आदिके लिये श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इनमें दिया हुआ दान अक्षय होता है। ब्रह्मन् ! कन्या, मिथुन, मीन और धनकी संक्रान्तियोंमें बादकी सोलह घटिकाएँ पुण्यदायक जाननी चाहिये। मकर-संक्रान्तिको उत्तरायण संक्रम कहा गया है। इसमें पूर्वकी चालीस और बादकी तीस घड़ियाँ स्नान-दान आदिके लिये पवित्र मानी गयी हैं। विप्रवर ! यदि सूर्य और चन्द्रमा ग्रहण लगे हुए ही अस्त हो जायँ तो दूसरे दिन उनका शुद्ध मण्डल देखकर ही भोजन करना चाहिये।

धर्मकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंने अमावस्या दो प्रकारकी बतायी है—सिनीवाली और कुहू। जिसमें चन्द्रमाकी कला देखी जाती है, वह चतुर्दशीयुक्त अमावस्या सिनीवाली कही जाती है और जिसमें चन्द्रमाकी कलाका सर्वथा क्षय हो जाता है, वह चतुर्दशीयुक्त अमावस्या कुहू मानी गयी है*। अग्निहोत्री द्विजोंको श्राद्धकर्ममें सिनीवाली अमावस्याको ही ग्रहण करना चाहिये तथा स्त्रियों, शूद्रों और अग्निरहित द्विजोंको कुहूमें श्राद्ध करना चाहिये। यदि अमावस्या तिथि अपराह्नकालमें व्याप्त हो तो क्षय (मृत्यु-कर्म)-में पूर्व-तिथि और वृद्धि (जन्म-कर्म)-में उत्तर-तिथिको ग्रहण करना चाहिये। यदि अमावस्या मध्याह्नकालके बाद प्रतीत हो तो शास्त्रकुशल साधु पुरुषोंने उसे भूतविद्धा (चतुर्दशीसे संयुक्त) कहा है। जब तिथिका अत्यन्त क्षय होनेसे दूसरे दिन वह अपराह्नव्यापिनी न हो तब (पूर्व दिनकी) सायंकालव्यापिनी सिनीवाली तिथिको ही श्राद्धमें ग्रहण करना चाहिये। यदि तिथिकी अतिशय वृद्धि होनेपर वह दूसरे दिन अपराह्नकालतक चली गयी हो तो चतुर्दशी-विद्धा अमावस्याको त्याग दे और कुहूको ही श्राद्धकर्ममें ग्रहण करे।


*अमावस्याके तीन विभाग हैं—सिनीवाली, दर्श और कुहू। चतुर्दशीका अन्तिम प्रहर और अमावस्याके आठ प्रहर इस प्रकार यह नौ प्रहरका समय चन्द्रमाके क्षयका काल माना गया है। इनमेंसे पहले दो प्रहरोंमें चन्द्रमाकी कला विराजमान रहती है, अतः उसे सिनीवाली कहते हैं और अन्तिम दो प्रहरोंमें चन्द्रमाकी कलाका पूर्णतः क्षय हो जाता है। अतः उसीका नाम कुहू है और बीचके जो शेष पाँच प्रहर हैं उनका नाम दर्श है।