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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 117 of 770

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Page 117

* पूर्वभाग-प्रथम पाद *
११५

यौवनसे सम्पन्न हैं। इनके तीन नेत्र हैं। व्याघ्रका चर्म इन्होंने वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा है। इनके हाथोंमें खट्वाङ्ग, त्रिशूल, अक्षवलय और अभयकी मुद्रा है। तेजोमयी विद्युत्के समान देदीप्यमान जटामें बालचन्द्रमाका मुकुट शोभा पा रहा है। ये आनन्दमें मग्न हैं। वृषभ इनका वाहन है। शरीरका रंग (कपूरके समान) गौर है और यजुर्वेद इनका स्वरूप है। इस रूपमें ध्यान करने योग्य सावित्री हमारे ऐश्वर्यकी वृद्धि करें।'

ध्येया सा च सरस्वती भगवती पीताम्बरालङ्कृता
श्यामा श्यामतनुर्जरा परिलसद् गात्राञ्चिता वैष्णवी।
तार्क्ष्यस्था मणिनूपुराङ्गदलसद्ग्रैवेयभूषोज्ज्वला
हस्तालङ्कृतशङ्खचक्रसुगदापद्मा श्रियै चास्तु नः ॥
(ना० पूर्व० २७। ५७)

'सायंकालमें वही गायत्री विष्णुशक्ति भगवती सरस्वतीका रूप धारण करती हैं। उनके श्रीअङ्ग पीताम्बरसे अलङ्कृत होते हैं। उनका रंग-रूप श्याम है। शरीरका एक-एक अवयव श्याम है। विभिन्न अङ्गोंमें जरावस्थाके लक्षण प्रकट होकर उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे गरुड़पर बैठी हैं। मणिमय नूपुर, भुजबंद और सुन्दर हार, हमेल आदि भूषणोंसे उनकी स्वाभाविक प्रभा और बढ़ गयी है। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और उत्तम गदा तथा पद्म सुशोभित हैं। इस रूपमें ध्यान करनेयोग्य सरस्वतीदेवी हमारी श्रीवृद्धि करें।'

इस प्रकार ध्यान करके गायत्री-मन्त्रका जप करे। प्रातः और मध्याह्नकालमें खड़े होकर तथा सायंकालमें बैठकर भक्तिभावसे गायत्रीके ध्यानमें ही मनको लगाये हुए जप करना चाहिये। प्रति समयकी संध्योपासनामें गायत्रीदेवीका एक हजार जप उत्तम, एक सौ जप मध्यम तथा कम-से-कम दस बार जप साधारण माना गया है। आरम्भमें प्रणव फिर 'भूर्भुवःस्वः' उसके बाद 'तत्सवितुः' इत्यादि त्रिपदा गायत्री—यही जपनेयोग्य गायत्री-मन्त्रका स्वरूप है। मुने ! ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और यतिके द्वारा जो गायत्री-मन्त्रका जप होता है, उसमें छः प्रणव लगावे अथवा आदि-अन्तमें प्रणव लगाकर मन्त्रको उसमें सम्पुटित कर दे। परंतु गृहस्थके लिये केवल आदिमें एक प्रणव लगानेका नियम है। ऐसा ही मन्त्र उसके लिये जपनेयोग्य है। तदनन्तर यथाशक्ति जप करके उसे भगवान् सूर्यको निवेदित करे। फिर गायत्री तथा सूर्यदेवताके लिये एक-एक अञ्जलि जल छोड़े। तत्पश्चात् 'उत्तरे¹ शिखरे देवि' इत्यादि मन्त्रसे गायत्रीदेवीका विसर्जन करते हुए कहे—'देवि ! श्रीब्रह्मा, शिव तथा भगवान् विष्णुकी अनुमति लेकर सादर पधारो।' इसके बाद दिशाओं और दिग्देवताओंको हाथ जोड़कर प्रणाम करनेके अनन्तर प्रातःकाल आदिका दूसरा कर्म भी विधिपूर्वक सम्पन्न करे। देवर्षे ! गृहस्थ पुरुष तो प्रातःकाल और मध्याह्नकालमें स्नान करे। परंतु वानप्रस्थी तथा संन्यासीको तीनों समय स्नान करना चाहिये। जो रोग आदिसे कष्ट पा रहे हों उनके लिये तथा पथिकोंके लिये एक ही बार स्नानका विधान किया गया है। मुनीश्वर ! संध्योपासनके अनन्तर द्विज हाथमें कुश धारण करके ब्रह्मयज्ञ करे। यदि दिनमें बताये गये कर्म प्रमादवश न किये गये हों तो रातके पहले पहरमें उन्हें क्रमशः पूर्ण कर लेना चाहिये। जो धूर्त बुद्धिवाला द्विज आपत्तिकाल न होनेपर भी संध्योपासन नहीं करता, उसे सब धर्मोंसे भ्रष्ट एवं पाखण्डी समझना चाहिये। जो कपटपूर्ण झूठी युक्ति देनेमें चतुर होनेके कारण संध्या आदि कर्मोंको अनावश्यक बताते हुए उनका त्याग करता है, उसे महापातकियोंका सिरमौर समझना चाहिये²।


१. तैत्तिरीय आरण्यकमें 'उत्तमे शिखरे' ऐसा पाठ मिलता है। इस पुराणमें 'उत्तरे शिखरे' आया है।
२. यस्तु संध्यादिकर्माणि कूटयुक्तिविशारदः। परित्यजति तं विद्यान्महापातकिनां वरम्॥ (ना० पूर्व० २७। ६८)