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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

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* संक्षिप्त नारदपुराण *

तीर्थोंका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये—
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा।
आगच्छन्तु महाभागाः स्नानकाले सदा मम ॥
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची ह्यवन्तिका।
पुरी द्वारावती ज्ञेयाः सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥
(ना० पूर्व० २७। ३३-३५)

'गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी नामवाली नदियाँ इस जलमें निवास करें। पुष्कर आदि तीर्थ और गङ्गा आदि परम सौभाग्यवती नदियाँ सदा मेरे स्नानकालमें यहाँ पधारें। अयोध्या, मथुरा, हरद्वार, काशी, काञ्ची, अवन्ती (उज्जैन) और द्वारकापुरी—इन सातोंको मोक्षदायिनी समझना चाहिये।'

तदनन्तर श्वासको रोके हुए पानीमें डुबकी लगावे और अघमर्षण सूक्तका जप करे। फिर स्नानाङ्ग-तर्पण करके आचमनके पश्चात् सूर्यदेवको अर्घ्य दे। नारदजी! उसके बाद सूर्यभगवान्‌का ध्यान करके जलसे बाहर निकलकर बिना फटा हुआ शुद्ध धौतवस्त्र धारण करे। ऊपरसे दूसरा वस्त्र (चादर) भी ओढ़ ले। तत्पश्चात् कुशासनपर बैठकर संध्याकर्म प्रारम्भ करे। ब्रह्मन् ! ईशानकोणकी ओर मुख करके गायत्री-मन्त्रसे आचमन करे, फिर 'ऋतञ्च' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके विद्वान् पुरुष दुबारा आचमन करे। तदनन्तर अपने चारों ओर जल छिड़ककर अपने-आपको उस जलसे आवेष्टित करे। अपने शरीरपर भी जल सींचे। फिर प्राणायामका संकल्प लेकर प्रणवका उच्चारण करनेके बाद प्रणवसहित सातों व्याहृतियोंके तथा गायत्री-मन्त्रके ऋषि, छन्द और देवताओंका स्मरण¹ करते हुए (विनियोग करते हुए) भूः आदि सात व्याहृतियोंद्वारा मस्तकपर जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् मन्त्रज्ञ पुरुष पृथक्-पृथक् करन्यास और अङ्गन्यास करे। पहले हृदयमें प्रणवका न्यास करके मस्तकपर भूःका न्यास करे। फिर शिखामें भुवःका, कवचमें स्वःका, नेत्रोंमें भूर्भुवःका तथा दिशाओंमें भूर्भुवः स्वः—इन तीनों व्याहृतियोंका और अस्त्रका न्यास करे। तीन बार हथेलीपर ताल देना ही अस्त्रन्यास है²। तदनन्तर प्रातःकाल


१. ॐकारसहित व्याहृतियोंका, गायत्री-मन्त्रका तथा शिरोमन्त्रका विनियोग या उनके ऋषि, छन्द और देवताओंका स्मरण इस प्रकार है—
ॐकारस्य ब्रह्म ऋषिर्देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, सप्तव्याहृतीनां प्रजापतिऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती-पङ्क्तित्रिष्टुब्जगत्यश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्यबृहस्पतिवरुणेन्द्रविश्वेदेवा देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता, आपो ज्योतिरिति शिरसः प्रजापतिऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः।
२. आधुनिक संध्याकी प्रतियोंमें न्यासकी विधि सूर्योपस्थानके बाद दी हुई है। परंतु नारदपुराणके अनुसार प्राणायामके पहले तथा जपके पहले भी न्यास करना चाहिये। मूलमें करन्यास और अङ्गन्यास दोनोंकी चर्चा की गयी है। पर विधि केवल अङ्गन्यासकी ही दी गयी है। जिसका प्रयोग इस प्रकार होता है—
ॐ हृदयाय नमः। ॐ भूः शिरसे स्वाहा। ॐ भुवः शिखायै वषट्। ॐ स्वः कवचाय हुम्। ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट्। ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्।
उपर्युक्त छः मन्त्रवाक्य अङ्गन्यासके हैं। इनमेंसे पहले वाक्यका उच्चारण करके दाहिने हाथकी हथेलीसे हृदयका स्पर्श करे। दूसरे वाक्यको पढ़कर अँगूठेसे मस्तकका स्पर्श करना चाहिये। तीसरे वाक्यका उच्चारण करके अंगुलियोंके अग्रभागसे शिखाका स्पर्श करे। चतुर्थ वाक्य पढ़कर दाहिने हाथकी अंगुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी अंगुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करे। पञ्चम वाक्यसे अनामिका और अङ्गुष्ठद्वारा दोनों नेत्रोंका स्पर्श करना चाहिये। छठा वाक्य बोलकर दाहिने हाथको बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिने ओरसे