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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 110 of 770

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Page 110

१०८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

संध्याके समय, अकालमें मेघकी गर्जना होनेपर, असमयमें वर्षा होनेपर, उल्कापात तथा वज्रपात होनेपर, अपने द्वारा किसी ब्राह्मणका अपमान हो जानेपर, मन्वादि तिथियोंके आनेपर तथा युगादि चार तिथियोंके उपस्थित होनेपर सब कर्मोंके फलकी इच्छा रखनेवाला कोई भी द्विज अध्ययन न करे। वैशाख शुक्ला तृतीया, भाद्र कृष्णा त्रयोदशी, कार्तिक शुक्ला नवमी तथा माघकी पूर्णिमा—ये तिथियाँ युगादि कही गयी हैं। इनमें जो दान दिया जाता है, उसके पुण्यको ये अक्षय बनानेवाली हैं¹। नारदजी! आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिक शुक्ला द्वादशी, चैत्र तथा भाद्रपदमासकी तृतीया, आषाढ़ शुक्ला दशमी, माघ शुक्ला सप्तमी, श्रावण कृष्णा अष्टमी, आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा, फाल्गुनकी अमावास्या, पौष शुक्ला एकादशी तथा कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमा तिथियाँ—ये मन्वन्तरकी आदितिथियाँ बतायी गयी हैं, जो दानके पुण्यको अक्षय बनानेवाली हैं²। द्विजोंको मन्वादि और युगादि तिथियोंमें श्राद्ध करना चाहिये। श्राद्धका निमन्त्रण हो जानेपर, चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके दिन, उत्तरायण और दक्षिणायन प्रारम्भ होनेके दिन, भूकम्प होनेपर, गलग्रहमें और बादलोंके आनेसे अँधेरा हो जानेपर कभी अध्ययन न करे। नारदजी! इन सब अनध्यायोंमें जो अध्ययन करते हैं, उन मूढ़ पुरुषोंकी संतति, बुद्धि, यश, लक्ष्मी, आयु, बल तथा आरोग्यका साक्षात् यमराज नाश करते हैं। जो अनध्यायकालमें अध्ययन करता है, उसे ब्रह्म-हत्यारा समझना चाहिये। जो ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंका अध्ययन न करके अन्य कर्मोंमें परिश्रम करता है, उसे शूद्रके तुल्य जानना चाहिये, वह नरकका प्रिय अतिथि है। वेदाध्ययनरहित ब्राह्मणके नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा दूसरे जो वैदिककर्म हैं, वे सब निष्फल होते हैं। भगवान् विष्णु शब्द-ब्रह्ममय हैं और वेद साक्षात् श्रीहरिका स्वरूप माना गया है। जो ब्राह्मण वेदोंका अध्ययन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।


१. तृतीया माधवे शुक्ला भाद्रे कृष्णा त्रयोदशी। कार्त्तिके नवमी शुद्धा माघे पञ्चदशी तिथिः॥
एता युगाद्याः कथिता दत्तस्याक्षयकारिकाः। (ना० पूर्व० २५। ५०-५१)
स्कन्दपुराणके अनुसार भिन्न-भिन्न युगकी आदितिथि इस प्रकार हैं—कार्त्तिक शुक्ला नवमी सत्ययुगकी, वैशाख शुक्ला तृतीया त्रेतायुगकी, माघकी पूर्णिमा द्वापरकी और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी कलियुगकी आदितिथि है।
२. अश्वयुक्शुक्लनवमी कार्त्तिके द्वादशी सिता। तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥
आषाढशुक्लदशमी सिता माघस्य सप्तमी। श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा॥
फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौषस्यैकादशी सिता। कार्त्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्यैष्ठी पञ्चदशी सिता॥
मन्वादयः समाख्याता दत्तस्याक्षयकारिकाः। (ना० पूर्व० २५। ५१-५५)
स्कन्दपुराणमें भी मन्वादि तिथियोंका पाठ ऐसा ही है। केवल श्लोकोंके क्रममें थोड़ा अन्तर है।