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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 96 of 178

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९४ प्रेम-दर्शन
देवर्षि नारद आनन्दमें भरकर पुकार रहे हैं कि जो इस
प्रकार भगवान्‌के प्रेममें मतवाला हो जाता है वह स्वयं तो तर
ही गया, अपितु वह समस्त लोकोंको भी तार देता है। वही
सच्चा तरन-तारन होता है। भगवान्‌ने भी श्रीमद्भागवतमें कहा
है—‘मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति’—ऐसा मेरा भक्त त्रिभुवनको
पवित्र कर देता है।
छियालीसवें सूत्रमें मायासे कौन तरता है, यह प्रश्न करके
यहाँतक उसका उत्तर दिया गया। चार सूत्रोंमें प्रेमके साधन और
प्रेमियोंके लक्षण बतलाये गये। अब आगे उस प्रेमका रूप बतलाया
जायगा, जिसको पाकर प्रेमी महानुभावगण इस दुर्लभ स्थितिको
स्वाभाविक गुणोंके रूपमें अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं।
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