प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमा-भक्तिका फल और भक्तिकी सर्वश्रेष्ठता १७३
८२-यह प्रेमरूपा भक्ति एक होकर भी १ गुणमाहात्म्यासक्ति,
२ रूपासक्ति, ३ पूजासक्ति, ४ स्मरणासक्ति, ५ दास्यासक्ति,
६ सख्यासक्ति, ७ कान्तासक्ति, ८ वात्सल्यासक्ति,
९ आत्मनिवेदनासक्ति, १० तन्मयतासक्ति और ११ परम
विरहासक्ति—इस प्रकारसे ग्यारह प्रकारकी होती है।
जो महात्माजन प्रेमरूपा भक्तिकी पूर्णताको पहुँच जाते हैं,
उनमें तो यह सभी आसक्तियाँ रहती हैं। जैसे श्रीव्रजगोपियोंमें
थीं; जिनका उदाहरण देवर्षि नारदजी पहले दे चुके हैं।
सबका विकास नहीं होता तो अपनी-अपनी रुचिके अनुसार
इनमेंसे केवल एक या एकाधिक भावोंसे भगवान्के साथ
प्रेम किया जाता है। प्रेम एक ही वस्तु है, इसलिये इन
प्रेमियोंमें, प्रेमासक्तिके भेदसे किसीमें ऊँच-नीचकी भावना
नहीं करनी चाहिये।
इन भिन्न-भिन्न आसक्तियोंसे भगवान्को भजनेवाले असंख्य
भक्त हो गये हैं। उदाहरणके लिये कुछ नाम यहाँ दिये जाते हैं—
१—गुणमाहात्म्यासक्त भक्त—देवर्षि नारद, महर्षि वेदव्यास,
शुकदेव, याज्ञवल्क्य, काकभुशुण्डि, शेष, सूत, शौनक, शाण्डिल्य,
भीष्म, अर्जुन, परीक्षित्, पृथु, जनमेजय आदि।
२—रूपासक्त भक्त—मिथिलाके नर-नारी, राजा जनक,
दण्डकारण्यके ऋषि, व्रजनारियाँ आदि।
३—पूजासक्त भक्त—श्रीलक्ष्मीजी, राजा पृथु, अम्बरीष,
श्रीभरतजी आदि।
४—स्मरणासक्त भक्त—प्रह्लादजी, ध्रुवजी, सनकादि।
५—दास्यासक्त भक्त—श्रीहनूमान्जी, अक्रूरजी, विदुरजी
आदि।