प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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तथा गुणोंपर विश्वास हो जायगा तो मन स्वतः ही भगवान्की
ओर लग जायगा। मनुष्यको जो कुछ चाहिये, भगवान्
सभीके भण्डार हैं। ज्ञान चाहिये, भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं; प्रेम
चाहिये, भगवान् प्रेममय हैं; आनन्द चाहिये, भगवान् आनन्दघन
हैं; वैराग्य चाहिये, भगवान् परम विरागमय हैं; धन चाहिये,
धनकी स्वामिनी लक्ष्मीजी अपनी चंचलताको छोड़कर निरन्तर
उनकी चरणसेवा करती हैं; ऐश्वर्य चाहिये, सारा जगत् उन्हींके
ऐश्वर्यके एक कणका प्रकाश है; यश चाहिये, यशकी धारा
वहींसे निकलती है; सारांश यह कि संसारमें हम जो कुछ भी
सौन्दर्य, माधुर्य, प्रेम, स्नेह, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, धन, भोग,
सुख आदि देखते हैं और इन सब वस्तुओंके सम्बन्धमें
जहाँतक हमारी ऊँची-से-ऊँची कल्पना होती है वह सब कुछ
भगवान्के एक क्षुद्र अंशमें ही रह जाता है। हमारे इस जगत्के
पदार्थ और पदार्थोंकी हमारी कल्पना उस अखिल सौन्दर्य,
माधुर्य, ऐश्वर्यादि सद्गुण-सागरकी एक बूँदकी भी बराबरी नहीं
कर सकती। जो इस प्रकार भगवान्को जान लेता है और
विश्वास कर लेता है, वह भगवान्को छोड़कर आधे क्षणके लिये
भी दूसरी ओर मन नहीं लगा सकता और न वह जगत्के क्षणिक
भोगोंके उदय और विनाशमें हर्ष और शोकको ही प्राप्त होता
है। अवश्य ही आस्तिकतामें विश्वास सच्चा होना चाहिये।
भगवान्की सत्ताके विश्वासमें हमें प्रह्लादका इतिहास सदा याद
करना चाहिये। हिरण्यकशिपुकी आज्ञासे सैकड़ों-हजारों दुर्दान्त
दानव बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र लेकर प्रह्लादको मारने दौड़ते हैं। वह
कहता है—