मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context६६ मुद्राराक्षस-
राक्षस ।- (घबड़ा कर) क्या चन्दनदास को मार डाला ?
विराधगुप्त ।-नहीं, मारा तो नहीं, पर स्त्री पुत्र धन समेत
बाध कर बन्दी घर में भेज दिया।
राक्षस ।-तो क्या ऐसा सुखी हो कर कहते हो कि बन्धन
५ मे भेज दिया ? अरे ! यह कहो कि मन्त्री राक्षस को
कुटुम्ब सहित बाघ रक्खा है।
( प्रियम्वदक आता है। )
प्रियम्वदक ।-जय जय महाराज ! बाहर शकटदास खड़े हैं।
राक्षस ।-( आश्चर्य से ) सच ही !
१० प्रियम्वदक ।-महाराज ! आप के सेवक कभी मिथ्या
बोलते हैं ?
राक्षस ।-मित्र विराधगुप्त ! यह क्या ?
विराधगुप्त ।-महाराज ! होनहार जो बचाया चाहे तो कौन
मार सकता है ?
१५ राक्षस ।-प्रियम्वदक ! अरे जो सच ही कहता है तो उन
को झटपट लाता क्यों नहीं ?
प्रियम्वदक ।-जो आज्ञा (जाता है) ।
(सिद्धार्थक के संग शकटदास आता है)
शकटदास ।-देख कर (आप ही आप)
२० वह सूली गड़ी जो बड़ी दृढ़ कै,
सोई चन्द्र को राज थिर्यो प्रन तैं।
लपटी वह फास की डोर सोई,
मनु श्री लपटी वृषलै मन ते ॥
बजी डौड़ी निरादर की नृप नन्द के,
२५ सोऊ लख्यो इन आखन ते।
नहि जानि परै इतनोहूं भए,
केहि हेत न प्रान कढ़े तन तैं ॥