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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

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१६० मुद्राराक्षस -

ये और पञ्जाब से लेकर गुजरात दक्षिण तक के हिन्दू मगध देश मे जाकर प्राणत्याग करना बडा पुण्य समझते थे। प्रजा पाल नामक एक राजा ने सन् १४०० के लगभग बोस बरस मगध देश को स्वतन्त्र रक्खा। किन्तु आय्यमत्सरी दैव ने यह स्वतन्त्रता स्थिर नही रक्खी और पुण्यधाम गया फिर मुसलमानों के अधिकार में चला गया। सन् १४७८ तक यह प्रदेश जौनपुर के बादशाह के अधिकार म रहा। फिर बहलोलवश ने इस को जीत लिया था, किन्तु १०६१ मे सनशाह ने फिर जीत लिया। इस के पीछे बगाल के पठानां से और जोनपुर वालों से कई लड़ाई हुई और १४६४ मे दोनों राज्य मे एक सुलहनामा हो गया। इस के पीछे सूर लोगों का अधिकार हुआ और शेरशाह ने बिहार छोड कर पटने को राजधानी किया। सूरों के पीछे क्रमान्वय से (१५७५ ई०) यह देश मुगलों के अधीन हुआ और अन्त में जरासन्ध और चन्द्रगुप्त की राजधानी पवित्र पाटलिपुत्र ने आर्य्य वेश और आर्य्य नाम परित्याग कर के औरङ्गजेब के पोते अजीमशाह के नाम पर अपना नाम अजीमाबाद प्रसिद्ध किया। (१६६७ ई०) बगाले के सूबेदारो में सब से पहले सिराजुद्दौला ने अपने को स्वतन्त्र समझा था किन्तु १७५७ ई० की पलासी की लडाई मे मीरजाफर अङ्गरेजो के बल से बिहार, बगाला और उडीसा का अधिनायक हुआ। किन्तु अन्त मे जगद्विजयी अङ्गरेजो ने सन १७६३ मे पूर्व मे पटना अधिकार करके दूसरे बरस बक्सर की प्रसिद्ध लड़ाई जीत कर स्वतन्त्र रूप से सिहचिन्ह की ध्वजा की छाया के नीचे इस देश के प्रात मात्र को हिन्दुस्तान के मानचित्र मे लाल रङ्ग से स्थापित कर दिया।