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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 148 of 173

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Page 148

उपसंहार ( अक्षर ) क । १५१

जग मै घर की फूट बुरी । घर के फूटहि सों बिनसाई
सुबरन लंकपुरी ॥ फूटहि सों सब कौरव नासे भारत युद्ध
भयो । जाको घाटो या भारत मै अब लौ नहि पुजयो ॥
फूट हि सों जयचन्द बुलायो जवनन भारत धाम । जाको फल
अबलौ भोगत सब आरज होइ गुलाम ॥ फूटहि सों नवनन्द ५
बिनासे गया मगध को राज । चन्द्रगुप्त को नासन चाह्यो
आपु नसे सहसाज ॥ जो जग मै धन मान और बल आपुनो
राखन होय । तो अपने घर मै भूलेहू फूट करौ मति कोय ॥३॥
( दूसरे अङ्क की समाप्ति और तीसरे अङ्क के आरम्भ में )
जग मै तेई चतुर कहावैं । जे सब विधि अपने कारज को १०
नीको भांति बनावै ॥ पढ़्यौ लिख्यौ किन होइ जुपै नहि कारज
साधन जानै । ताही कों मूरख या जग मै सब कोऊ अनुमानै ॥
छल मै पातक होत जदपि यह शास्त्रन मै बहु गायो । पे
अरि सों छल किए दोष नहि मुनियन यहै बताया ॥४॥
( तीसरे अङ्क की समाप्ति और चतुर्थ अङ्क के आरम्भ मे ) १५
ठुमरी—तिन को ना कछू कबहुं बिगरै, गुरु लोगन को
कहनो जे करैं । जिन कों गुरु पन्थ दिखावत है ते कुपन्थ
पै भूलि न पाव धरैं ॥ जिन कों गुरु अच्छत आप रहैं ते बिगारे
न बैरिन के बिगरैं । गुरु को उपदेस सुनौ सब ही, जग
कारज जासों सबै समरै ॥ ५ ॥ २०
( चतुर्थ अङ्क की समाप्ति और पंचम अङ्क के आरम्भ मे )
पूरबी—करि मूरख मित्र मिताई, फिर पछुतैहो रे भाई ।
अंत दगा खैहौ सिर धुनिहौ रहिहौ सबै गँवाई ॥ मूरख जो
कछु हितहू करै तो तामै अन्त बुराई । उलटो उलटो काज
करत सब दैहै अंत नसाई ॥ लाख करौ हित मूरख सों पै २५
नाहि न कछु समझाई । अन्त बुराई सिर पै ऐहै रहि जैहो मुह
बाई ॥ फिर पछितैहो रे भाई ॥ ६ ॥