मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in contextछठा अङ्क । १३५
पुरुष ।—कि देव! हमारे घर मे जो कुछ कुटुम्बपालन का द्रव्य
है आप सब ले लें, पर हमारे मित्र चन्दनदास को छोड़ दे।
राक्षस ।—(आप ही आप) वाह जिष्णुदास ! तुम धन्य हो !
तुम ने मित्रस्नेह का निर्वाह किया।
जा धन के हित नारि तजै पति पूत तजै पितु सीलहि खोई। ५
भाई सौं भाई लरै रिपुसे पुनि मित्रता मित्र तजै दुख जोई ॥
ता धनको बनिया ह्वै गिन्यौ न दियो दुख मीत सौं आरत होई।
स्वारथ अर्थ तुम्हारोई है तुमरे सम और न या जग कोई ॥
(प्रकाश) इस बात पर मौर्य ने क्या कहा ?
पुरुष ।—आर्य ! इस पर चन्द्रगुप्त ने उस से कहा कि जिष्णु- १०
दास ! हम ने धन के हेतु चन्दनदास को नही दण्ड दिया
है। इस ने अमात्य राक्षस का कुटुम्ब अपने घर मे छिपा-
या, और बहुत मागने पर भी न दिया। अब भी जो यह दे दे
तो छूट जाय, नही तो इस को प्राणदण्ड होगा। तभी
हमारा क्रोध शान्त होगा और दूसरे लोगों को भी इस से १५
डर होगा—यह कह उस को वधस्थान मे भेज दिया। जिष्णु-
दास ने कहा कि "हम कान से अपने मित्र का अमङ्गल
सुनने के पहिले मर जाय तो अच्छी बात है' और अग्नि
मे प्रवेश करने को बन मे चले गए। हम ने भी इसी हेतु
कि उनका मरण न सुनें यह निश्चय किया कि फासी २०
लगा कर मर जाय और इसी हेतु यहा आए है।
राक्षस ।—(घबड़ा कर) अभी चन्दनदास को मारा तो नही ?
पुरुष ।—आर्य्य ! अभी नहीं मारा है, बारम्बार अब भी उन
से अमात्य राक्षस का कुटुम्ब मागते है और वह मित्र-
वत्सलता से नही देते, इसी मे इतना विलम्ब हुआ। २५
राक्षस ।—(सहर्ष आप ही आप) वाह मित्र चन्दनदास !
वाह ! धन्य ! धन्य !