मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context१२८ मुद्राराक्षस—
सिद्धार्थक ।—तब इधर से सब सामग्री ले कर आर्य चाणक्य
बाहर निकले और विपक्ष के शेष राजाओं को नि शेष
कर के बहर लोगों की सब सामग्री लूट ली।
समिद्धार्थक । तो वह सब अब कहा हैं ?
५ सिद्धार्थक ।—वह देखो
स्रवत गडमद गरब गज, नदत मेघ अनुहार।
चाबुक भय चिनवत चपल, खडे अस्व बहु द्वार ॥
समिद्धार्थक ।—अच्छा, यह सब जाने दो यह कहो कि सब
लोगों के सामने इतना अनादर पाकर फिर भी आर्य्य
१० चाणक्य उसी मन्त्री के काम का क्यों करते है ?
सिद्धार्थक ।—मित्र ! तुम अब तक निरे सीधेसाधे बने हौ।
अरे, अमात्य राक्षस भी आर्य चाणक्य की जिन चालों
को नही समझ सकते उन को हम तुम क्या समझैगे !
समिद्धार्थक ।—वयस्य ! अमात्य राक्षस अब कहा है ?
१५ सिद्धार्थक ।—उस प्रलय कोलाहल के बढ़ने के समय मलय-
केतु की सेना से निकल कर उन्दुर नामक चर के साथ
कुसुमपुर ही की ओर वह आते है, यह आर्य चाणक्य
को समाचार मिला है ।
समिद्धार्थक ।—मित्र ! नन्दराज्य के फिर स्थापन की प्रतिज्ञा
२० कर के स्वनाम तुल्य पराक्रम अमात्य राक्षस, उस काम
को पूरा किए बिना फिर कैसे कुसुमपुर आते है ?
सिद्धार्थक ।—हम सोचते है कि चन्दनदास के स्नेह से ।
समिद्धार्थक ।—ठीक है, चन्दनदास के स्नेह ही से । किन्तु
तुम सोचते हो कि चन्दनदास के प्राण बचैगे ?
२५ सिद्धार्थक ।—कहा उस दीन के प्राण बचैगे ? हमी दोनों
को वधस्थान मै ले जाकर उस को मारना पडेगा ।